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नर्मदा की तर्ज पर होगा तवा नदी और नहरों का पूजन

6 वर्ष पहले
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नर्मदापुरमसंभाग में अब नर्मदा की तरह तवा नदी और उससे जुड़ी नहरों का पूजन होगा तथा उत्सव भी मनाया जाएगा। कमिश्नर बीके बाथम की पहल पर इसके लिए पूरा प्लान बन रहा है। प्लान बनने के बाद लोगों से इससे लोगों को जोड़ा जाएगा और उत्सव को बड़े स्वरूप में मनाने के प्रयास होंगे। अप्रैल के बाद इस प्लान को लागू किया जाएगा।

होशंगाबाद और हरदा जिलों में फसलों के लिए तवा नदी जीवनदायिनी है। तवा नदी सतपुड़ा की वादियों में स्थित बैतूल के भैंसदेही से निकलकर होशंगाबाद के बांद्राभान में संगम स्थल पर नर्मदा में आकर मिलती है। इस नदी पर तवानगर में बांध बनाया गया है। इस बांध से होशंगाबाद और हरदा दोनों जिले में फसलों के लिए पानी दिया जाता है। दोनों जिलों के करीब 5 लाख हेक्टेयर में इस बांध की नहरों से फसलों की सिंचाई होती है। गेहूं, सोयाबीन, धान और चने की फसल इसी नदी के पानी के कारण लहलहा रही है। नहरों से पर्याप्त पानी मिलने के कारण खेती का रकबा और उत्पादन बढ़ता जा रहा है। कमिश्नर श्री बाथम ने बताया कि यह उत्सव संभाग के लिए नई पहल होगी। उदगम स्थल भैंसदेही में तवा नदी की पूजा होगी और तवा बांध के बाद जहां-जहां से नहरें निकली हैं, वहां के लोगों को इसका उत्सव मनाने के लिए कहा जाएगा। प्लान के अनुसार जब नहर में पानी आएगा तब किसान और आम लोग नहरों का पूजन करेंगे और दीपदान करेंगे। होशंगाबाद में तवा नदी से नहर निकली है, जो पवारखेड़ा के पास से होते हुए हरदा तरफ गई है।

होशंगाबाद| उत्सवके दौरान नहरों का भी पूजन किया जाएगा।

अभी नर्मदा जी का मनाते हैं उत्सव

फिलहालजिले में नर्मदा का उत्सव मनाते हैं। नर्मदा में सुबह- शाम लोग दीपदान करते हैं। नर्मदा जयंती पर उत्सव बड़े रूप में जगह-जगह मनाया जाता है। नर्मदा को प्रदूषण से बचाने के लिए भी लोग पहल करते हैं।

नहरों का रख-रखाव सुधरेगा

तवानदी और नहरों का उत्सव मनाने से नहरों का रख-रखाव भी सुधरेगा। लोग इनकी पूजन करेंगे, तो उन्हें इनका महत्व भी पता चलेगा। अभी लोग नहरों को सिर्फ पानी लेने का साधन मानते हैं और जगह-जगह से पानी लेने के लिए तोड़फोड़ करते हैं।

तवा बांध से ही बदली है जिले की तस्वीर

जिलेमें तवा बांध 1978 में बना है। बांध बनाने का काम 1958 में शुरू हुआ था, जो 20 सालों में बनकर तैयार हुआ। इसके बाद बांध से नहरों में पानी देना शुरू हुआ। इसके बाद ही खेतों की जमीन की कीमत बढ़ी और फसल लहलहा उठी। बांध बनने के बाद कई फसलें ली जानें लगीं। अब तो एक साल में तीन फसल ली जा रही हैं। इस बार तो कम बारिश के बावजूद मूंग की खेती के लिए भी पर्याप्त पानी मिलेगा। पानी के कारण ही धान का रकबा अब एक लाख 50 हजार हेक्टेयर में होने लगा है।