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मरीज लापरवाह, हर महीने 2700 जांचें डस्टबीन में

7 वर्ष पहले
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शासनने जिन गरीब मरीजों के लिए जांचें नि:शुल्क की हंै, वे ही उसकी रिपोर्ट लेने को लेकर संजीदा नहीं हैं। जिला अस्पताल की लैब में औसतन 150 मरीज जांच के लिए आते हैं। इनमें से 60 फीसदी यानी 2700 मरीज महीनेभर में रिपोर्ट लेने ही नहीं आते। नतीजतन लैब में रिपोर्ट का पुलिंदा जमा हो रहा है, जिसे संभालना कर्मचारियों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं। ऐसे में महीने में दो बार पुरानी रिपोर्ट को डस्टबीन में डाला जा रहा है।

डॉक्टर के कहने पर मरीज जांच करवाने में रुचि तो काफी दिखाते हैं लेकिन जांच रिपोर्ट लेने में नहीं। इससे शासन को तो नुकसान हो ही रहा है, मरीज को भी रिपोर्ट के बगैर यह पता नहीं चल पाएगा कि उसे बीमारी क्या है? बताया जाता है अगर डॉक्टर की दवाई-गोली के एक डोज से मरीज को फर्क पड़ जाता है तो वह आगे इलाज करवाने में रुचि नहीं लेता और रिपोर्ट लेने भी नहीं आता। यदि बाद में उनकी फिर तबीयत खराब होती है तो वे दौड़े दौड़े लैब में आते हैं लेकिन तब तक रिपोर्ट डस्टबीन में चली जाती है।

जिम्मेदार बोले

^डॉक्टर मरीजों को बीमारी के लक्षण के आधार पर जांच लिखता है। मरीज को चाहिए कि वह अपनी रिपोर्ट लेने आए। यह बात सही है कि सैकड़ों मरीज जांच कराने के बाद रिपोर्ट लेने नहीं आते। डॉ.आरजी कौशल, सिविलसर्जन, जिला अस्पताल

नहीं फेंकी रिपोर्ट...तो लग जाएगा ढेर

जिलाअस्पताल की लैब में औसतन 150 मरीज की रोजाना जांच की जाती है। इस लिहाज से महीनेभर का आंकड़ा साढ़े 4 हजार होता है। इसमें से 60 फीसदी यानी 2700 मरीज वापस अपनी रिपोर्ट लेने नहीं आते। यदि इन सभी को संभालते रहे तो रखने की जगह नहीं रहेगी। अस्पताल कर्मचारियों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

जांच का पुलिंदा इकट्ठा हो जाता है लेकिन मरीज लेने नहीं आते।

सामान्य बुखार में भी तीन से चार जांच

एक दिक्कत यह भी है कि डॉक्टर सामान्य बुखार में भी मरीज की तीन से चार जांच लिख रहे हैं। लिहाजा लैब के कर्मचारियों का काम बढ़ जाता है। उधर, जब मरीज जांच के बाद वापस रिपोर्ट लेने नहीं आता तो इसे संभालना एक नई परेशानी है। चूंकि सभी डॉक्टर स्पेशलिस्ट हैं तो वे लक्षण के आधार पर यदि जरूरी जांच ही लिखें तो यह समस्या कुछ हद तक हल हो सकती है।

सुविधा को बनाया मजाक | शासन जांचें करवा रहा नि:शुल्क, मरीज नहीं रहे हैं रिपोर्ट लेने

43 जांच होती है मुफ्त