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2007 में हुई आखिरी पीएचडी, फिर बंद हो गया हिंदी शोध केंद्र

7 वर्ष पहले
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पत्र लिखा, लेकिन जवाब नहीं आया

शहीदचंद्रशेखर आजाद शासकीय महाविद्यालय में हिंदी विषय पर शोध के लिए स्थापित किए गए शोध केंद्र से महज 3 लोग ही पीएचडी कर पाए। उसमें भी आखरी पीएचडी वर्ष 2007 में हुई। इसके बाद से ही केंद्र बंद है। ऐसा नहीं कि योग्य प्राध्यापक नहीं है, लेकिन प्रयास मजबूती से नहीं किए जा रहे। ऐसे में शोध केंद्र पर शोध करने जैसी स्थिति पैदा कर दी है।

महाविद्यालय में हिंदी विषय पर शोध के लिए हिंदी अध्ययन एवं शोध केंद्र स्थापित करने के लिए विश्वविद्यालय की हरी झंडी वर्ष 2001-2002 में मिली थी। यह संभव हुआ था हिंदी के तत्कालीन प्राध्यापक डॉ. सीपी शुक्ल के प्रयासों से। वे यहां विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त एकमात्र शोध निदेशक थे। जब केंद्र बना तो महाविद्यालय प्रबंधन को इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद बंधी थी। शुरुआती चरण में ऐसा लगा भी, जब पांच लोगों ने हिंदी विषय में पीएचडी करने के लिए केंद्र में पंजीयन कराया। इस बीच प्राध्यापक शुक्ल का निधन हो गया। तब से केंद्र भी अनाथ है। विश्वविद्यालय को लगा कि अब संचालन नहीं हो पाएगा तो यहां केंद्र ही बंद कर दिया गया।

हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयास नाकाफी: अशोक जैन

झाबुआ.हरवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाकर औपचारिकता पूर्ण की जाती है। हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं वे नाकाफी है। यह कहना है सेवानिवृत्त कार्यालय अधीक्षक अशोक जैन का। वे हिंदी की वर्तमान स्थिति को लेकर काफी चिंतित है। उन्होंने बताया वर्तमान में हिंदी के प्रति युवाओं का रुझान बढ़े, इसके लिए कोई स्पर्धा या अन्य कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जा रहे। शासनस्तर पर प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है।

^महाविद्यालय में हिंदी शोध केंद्र पुन: प्रारंभ करने के लिए पत्र तो लिखा, लेकिन अब तक जवाब नहीं आया है। यदि शोध केंद्र प्रारंभ होता है तो आदिवासी अंचल के विद्यार्थियों को काफी फायदा होगा। डॉ.अंजना सोलंकी, एचओडी,हिंदी विभाग

शहीद चंद्रशेखर आजाद शासकीय महाविद्यालय का मामला, योग्य प्राध्यापकों के बावजूद शुरू नहीं हो पा रहा

हिंदी दिवस आज |