सुदामा से मिलने नंगे पांव आए कृष्ण
गरीबीसे परेशान सुदामा परम मित्र द्वारिकाधीश कृष्ण के पास पहुंचे। द्वारपालों ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया और कृष्ण को संदेश भेजा। सुदामा का नाम सुनते ही कृष्ण उन्हें लेने नंगे पांव ही दौड़ पड़े।
भगवान श्रीकृष्ण सुदामा की मित्रता का प्रसंग पं. मुकेश शर्मा ने भागवत कथा में सुनाया। वे चिंताहरण हनुमान मंदिर में कथा के आखिरी दिन बोल रहे थे। उन्होंने कहा बचपन में सुदामा ने कृष्ण के हिस्से के चने अकेले खा लिए थे। उसका परिणाम सुदामा को भोगना पड़ा। सुदामा गरीबी से फटेहाल हो गए। घर में खाने के लिए कुछ नहीं बचा। प|ी-बच्चे भी परेशान हो गए। प|ी ने सुदामा को तीन मुठ्ठी चावल देकर कृष्ण के पास भेजा। सुदामा द्वारिका में कृष्ण के महल पहुंचे। द्वारपालों से कहा- मैं कृष्ण का मित्र हूं, उससे मिलना है। द्वारपालों ने फटेहाल सुदामा को द्वार पर ही रोक दिया। जब यह कृष्ण को पता चला तो वे अपना रनिवास छोड़ नंगे पांव ही सुदामा के पास पहुंच गए और उन्हें गले लगा लिया। सुदामा को राजमहल ले गए, उनके पैर धोने लगे। पैर देखकर कृष्ण के आंसू निकल पड़े और सुदामा के पग पखार दिए। उन्हें नए वस्त्र-आभूषण पहनाए। छप्पन पकवान खिलाए। सुदामा के हाथ से चावल की पोटली छीन ली। दो मुट्ठी चावल खाकर दो लोक न्योछावर कर दिए। सुदामा पर भगवान की अपार कृपा बरसी। सात दिन तक कथा सुनने से परीक्षित को भी मोक्ष मिला और उनका नाम अजर-अमर हो गया। इन प्रसंगों के साथ कथा का विश्राम हुआ।
चिंताहरण हनुमान मंदिर परिसर में भागवत कथा सुनती श्रद्धालु।
भागवत कथा