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कलेक्टर से की राख वितरण व्यवस्था में भेदभाव की शिकायत
ग्रेसिम के पॉवर प्लांटों से निकलने वाली राख (फ्लाइ एश) एक बार फिर सुर्खियों में है। राख वितरण व्यवस्था में कथित भेदभाव की शिकायत कलेक्टर तक जा पहुंची है। शिकायतकर्ता शंकरलाल प्रजापत के अनुसार नियमानुसार राख पर पहला हक स्थानीय प्रजापत समाज के उन लोगों का है, जो ईंट अथवा मिट्टी के बर्तनों का निर्माण करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि उद्योग को पॉवर प्लांट से निकलने वाली राख का 20 प्रतिशत मुफ्त में संबंधित समाज को उपलब्ध कराना है। बावजूद इस 20 प्रतिशत राख को खुले बाजार में मनमाने दाम पर बेचा जा रहा है। इससे प्रजापत समाज के गरीब तबके के लोगों को आजीविका चलाने में परेशानी उठाना पड़ रही है। शिकायत में यह भी मांग भी उठी है कि जिन लोगों को भी प्रबंधन मुफ्त में राख देने का राग अलाप रहा है। उस समिति में शामिल समाज के लोगों की नामजद सूची सार्वजनिक की जाए तो प्रबंधन के झूठ की कलई स्वत: ही खुल जाएगी। क्योंकि जिस व्यवसायी को मुफ्त में राख दी जा रही है, वह फर्जी नामों के सहारे राख का आवंटन ले रहा है। कागजों में भी फर्जी इंट्री की जा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि उद्योग में कार्यरत संबंधित विभाग के अधिकारी बिचौलिए बनकर राख से भारी मुनाफा कमा रहे हैं। कमीशन के इस खेल की जानकारी उद्योग के उच्च प्रबंधन को भी नहीं है। बता दें कि पॉवर प्लांटों से प्रतिदिन 600 टन राख का उत्पादन होता है। यह राख बाजार में 400 से 600 रुपए प्रति टन की दर पर बेची जाती है। इस मान से 120 टन राख रोजाना प्रजापत समाज को मुफ्त में दी जाना चाहिए।