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सरकारी नहीं, भारत कॉमर्स उद्योग की है जमीन
बंद पड़े भारत कॉमर्स उद्योग की सैकड़ों बीघा जमीन कारखाना भवन सहित अन्य संपत्तियों को सरकारी घोषित करना अवैधानिक है। सच्चाई यह है कि उद्योग के हक में सभी जमीन संपत्तियों की रजिस्ट्री शासन 6 मई 1958 को उद्योग के हक में कर चुका है। उक्त दावा टेक्सटाइल मजदूर कांग्रेस के प्रधानमंत्री गनी मोहम्मद ने जताते हुए बताया सरकारी दस्तावेज में जमीन का मालिकाना हक उद्योग के हक में वर्षों पूर्व ही बताया जा चुका है। गनी के अनुसार नागदा तहसीलदार ममता पटेल ने संपूर्ण भूमि को 4 अगस्त 2014 को ही भारत कॉमर्स का होना बताया है। तो फिर एकाएक कैसे यह जमीन कुछ दिनों में ही शासन को सरकारी लगने लगी। गनी सहित संगठन के रमेशचंद्र अखंड, अनिरुद्धलाल श्रीवास्तव, कन्हैयालाल पहाड़िया, कैलाशचंद्र जोशी, मकसूद बेग भोलेनाथ भारती ने मजदूरों को भरोसा दिलाया कि उच्च न्यायालय में मजदूरों को अधिक मुआवजा दिलाने के लिए संगठन द्वारा की गई कार्रवाई पूर्ण हो चुकी है। मजदूरों को घबराने की जरूरत नहीं है। अंतिम फैसला मजदूरों के हित में ही आएगा। बस हौंसला विश्वास बनाए रखें।
दावेके समर्थन में प्रस्तुत किए दस्तावेज
गनीने मीडिया के समक्ष दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए बताया 17 जुलाई 1943 एवं 24 फरवरी 1945 को ग्वालियर स्टेट गवर्नमेंट के गजट नोटिफिकेशन के तहत उक्त भूमि का स्थानांतरण किया गया था। उक्त भूमि लीज पर कतई नहीं दी गई थी। भूमि के विधिवत 7 पट्टे जारी कर पद्मावती राजे कॉटन मिल्स लिमिटेड नागदा के नाम से किए गए थे। उक्त दस्तावेज में लीज एवं भूमि भविष्य में शासन की होगी, ऐसी कोई शर्त नहीं रखी गई थी। इसके बाद तमाम संपत्ति को पद्माराजे कॉटन मिल्स से भारत कॉमर्स उद्योग के नाम पर बिरला परिवार द्वारा विधिवत रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के आधार पर 6 मई 1958 को खरीदा गया था। इसका विधिवत पंजीयन दस्तावेज क्रमांक 506/1958 भी उद्योग के पक्ष में हुआ था। साथ ही 26 अक्टूबर 1960 को भी विधिवत पंजीकृत दस्तावेज के तहत केशुराम कॉटन मिल्स एवं 6 अक्टूबर 1961 को पद्मावती राजे कॉटन मिल से ही अन्य अचल संपत्तियों को विधिवत रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के तहत खरीदा गया है। ऐसे में उक्त संपत्तियां शासन द्वारा प्रदान की हुई कैसे हो सकती है।
यह भी दिए साक्ष्य
^अपर कलेक्टर ने हमें पक्ष रखने का मौका ही नहीं दिया। जिन दस्तावेजों के सहारे टेक्सटाइल मजदूर कांग्रे