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चिता में कम लकड़ी का उपयोग, हजारों पेड़ बचाए

5 वर्ष पहले
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एक चिता जलाने के लिए तीन पेड़ों के बराबर लकड़ी लगती है। 5 करोड़ से ज्यादा पेड़ हर साल सिर्फ शव जलाने के लिए काटे जाते हैं। इससे 5 लाख टन राख और 80 लाख टन कार्बन गैस बनती है। 3 फरवरी को एक प्रकरण की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद देशभर में चिता जलाने के अन्य तरीकों को अपनाने पर बहस छिड़ गई है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने शवों के संस्कार के लिए इलेक्ट्राॅनिक क्रेमेटोरियम का हल सुझाया है। लेकिन शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने लकड़ी से चिता जलाने की परंपरा में बदलाव से हिंदू आस्था पर चोट की बात कहकर इलेक्ट्राॅनिक व्यवस्था को सिरे से नकार दिया है। कारण इलेक्ट्रिक दाह संस्कार में मांस की दुर्गंध आना है। ऐसे में नागदा के मुक्तिधाम में कार्यरत संकटार्थ सन्नद् सामाजिक समिति के सदस्यों का सहयोग लिया जाए तो पर्यावरण संरक्षण का हल ढूंढ रही एनजीटी को संकट का समाधान करने में सहायता मिल सकती है।

10 साल में बचाए 9 हजार पेड़- संस्था के रविकिशन पारीक के अनुसार मुक्तिधाम में हर साल लगभग 450 से 494 शवों का संस्कार होता है। 2006 से पहले एक चिता पर 4 क्विंटल लकड़ी लगती थी। साल 2006 से मुक्तिधाम की व्यवस्थाएं संभाल रही संस्था मात्र सवा से डेढ़ क्विंटल लकड़ी में ही दाह संस्कार करा देती है। संस्था अध्यक्ष अजय जोशी, सचिव गजेंद्र देशमुख के अनुसार लकड़ी का उपयोग कम से कम हो इसके लिए मुक्तिधाम में वैज्ञानिक तरीके से शव वेदी बनाई गई है। चिता जलाने के लिए एक समान लंबवत लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही चिता जलने के दौरान ब्लोअर का इस्तेमाल किया जाता है। इससे आग बुझती नहीं। कम लकड़ी से यहां मात्र 925 रुपए में अग्नि संस्कार पूर्ण हो जाता है। जबकि अन्य शहरों में यह खर्च 5 हजार रुपए से अधिक आता है।

नगर स्थित श्मशान घाट। यहां रखे ब्लोर के माध्यम से कम लकड़ी से करवाया जाता है दाह संस्कार।

...और पेड़ हमारे जीवन

में इसलिए हैं जरूरी
1 एकड़ में फैले पेड़ एक साल में उतनी कार्बन सोख लेते हैं, जितनी एक गाड़ी को 41843 किमी चलाने से पैदा होती है। 1 एकड़ में लगे पेड़ एक साल में 18 लोगों के लिए काफी ऑक्सीजन दे देते हैं। एक साल में एक पेड़ 118 किलो तक ऑक्सीजन देता है।

आखिरी अॉप्शन है

इलेक्ट्रिक क्रेमेटोरियम
इलेक्ट्रिक क्रेमेटोरियम में 500 रु. तक खर्च होते हैं। पारंपरिक तरीके से शव जलाने पर 5000 रुपए तक। पारंपरिक दाह संस्कार में 6 घंटे लग जाते हैं, जबकि इलेक्ट्रिक तरीके से सिर्फ 2 घंटे। अस्थियों से नदियां प्रदूषित नहीं होती, जबकि अधजले शवों से बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।

एनजीटी 3 फरवरी को...
धरती पर जब पहले व्यक्ति की मौत हुई होगी, तब से ही शवों के निपटाने की समस्या है। अब मानसिकता बदलने की जरूरत है। सरकार धार्मिक नेताओं के साथ मिलकर काम करे। चिता जलाने के वैकल्पिक इंतजाम करने होंगे।

शंकराचार्य 4 फरवरी को...
स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे किसी भी हालत में सहन नहीं किया जाएगा। हिंदू धर्म में चिता लकड़ी से ही जलाने का नियम है, इसे नहीं बदलने देंगे।

एनजीटी v/s धर्मगुरु
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