बदहाल भवनों में बच्चों की जान का जोखिम
नसरुल्लागंज. भवन की दीवारों में दरारें पड़ गई हैं जिनसे खतरा बना रहता है।
निज संवाददाता | नसरुल्लागंज/छिपानेर
तहसील क्षेत्र के छिपानेर गावं में 222 बच्चे कंडम भवन में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। यहां पर प्रबंधन द्वारा नवीन भवन की स्वीकृति के लिए प्रस्ताव बनाकर भेजने के बाद भी आज तक इस स्कूल को नवीन भवन की स्वीकृ़ति नहीं मिल सकी है। नतीजन माध्यमिक विद्यालय के स्कूली बच्चे 60 साल पुराने भवन में अपनी जान जोखिम में रख पढ़ाई कर रहे हैं।
प्रत्येक बच्चे को शिक्षा प्राप्त हो, इसके लिए शासन द्वारा नसरुल्लागंज क्षेत्र के प्रत्येक गांव में सर्व शिक्षा अभियान, सब पढ़े-सब बढ़ें स्कूल चलें हम अभियान चलाकर बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरुक कर रहा है, लेकिन इन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण निर्भिक शिक्षा प्रदान में शासन मूक दर्शक बना हुआ है। ऐसा ही नजारा क्षेत्र के नर्मदा तटीय गांव छिपानेर के मिडिल स्कूल में देखने को मिला, जहां शासन द्वारा वर्ष 1953 में बनाए गए स्कूल में आज तक 222 बच्चे कंडम स्कूल भवन में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
जर्जर हो चुकी हैं दीवारें
इस मिडिल शाला के कंडम भवन की प्रत्येक दीवार जर्जर हो चुकी है, जो किसी भी समय ढह कर किसी बड़ी दुर्घटना को अंजाम दे सकती है।
इस शाला भवन में कक्षा 6 से लेकर आठवीं तक चार कमरे हैं, लेकिन यह चारों कमरे पिछले तीन सालों से इतनी बुरी हालत में पहुंच चुके हैं कि यहां पर कभी भी कोई बड़ा हादसा घटित हो सकता है। गांव में नवीन हाईस्कूल हायर सेकंडरी भवन की तो बिल्डिंग बनी हुई है, लेकिन इसमें भी पर्याप्त मात्रा में इतने कमरे नहीं हैं कि मिडिल स्कूल के बच्चों को इस भवन में शिफ्ट किया जा सके।
हर साल बदलते हैं कबेलू
शाला प्रभारी बताते हैं कि प्रतिवर्ष शासन द्वारा शाला मरम्मत के रूप में दी जाने वाली 10 हजार रुपए की राशि भवन में बरसाती पन्नी, कबेलू दीवारों की मरम्मत करने में लग जाती है, इसके बाद कोई भी दूसरा कार्य करने के लिए कोई राशि नहीं बच पाती। बरसात के दिनों में तो स्कूल के एक सुरक्षित कमरे में पूरे बच्चों को एक साथ बैठाकर पढ़ाई कराना पड़ती है।
बारिश में नहीं होती पढ़ाई
कंडम भवन में छत पर चढ़े कबेलू पूरी तरह से टूट चुके हैं, जिसमें गर्मी के दिनों में जहां सूरज की रोशनी आने से बच्चे गर्मी से बेहाल रहते हैं तो बारिश के समय बारिश