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सैनिक सीमा साधे रहना...

7 वर्ष पहले
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दुश्मनका दर्द यही है। हम हर हमले पर संभले हैं..., ये वक्त बहुत नाजुक है, सैनिक सीमा साधे रहना..., सारे भारत को सालती है यह धारा, आतंकवाद को पालती है...बैतुल से आए वीर रस के कवि मदनमोहन समर वीर रस की कविताएं सुनाकर देशभक्ति का जोश भर दिया।

मौका था अग्रसेन जयंती के कार्यक्रमों के तहत मंगलवार रात दशहरा मैदान में हुए कवि सम्मेलन का। गीतकार कुंवर जावेद ने दिया बनूं तो पतंगा नसीब हो मुझको, नहाना चाहूं तो गंगा नसीब हो मुझको... मेरी तमन्ना अगर कोई है तो बस यह है, मैं यूं मरूं कि तिरंगा नसीब हो मुझको..., इसके साथ ही अपनी ख्यात रचना गुलमोहर गुलनार चमेली या गुलाब की प्रिय सहेली तुमको फूलों की रानी कैसे मानूं, मेरे मन के आंगन में एक बार खिलो तो जानूं...सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। श्रृंगार रस की कवियित्री डाॅ.कविता किरण अभी अभी जो खेल कर आई हाथी घोड़ा पालकी... काव्य रचना सुनाकर बचपन की याद दिला दी। हास्य कवि रासबिहारी गौड़ ने अक्टूबर में डांडिया नजारा सुधा सट्ट है, पति प|ी नाच रहे हैं, हाथ में लट्ठ है, लट्ठ की दहशत कुछ करने नहीं देती, प|ी जीने नहीं देती, करवा चौथ मरने नहीं देती..., महिलाओं और हास्य पर व्यंग्य कसते हुए उन्होंने हम लड़ते हैं झगड़ते हैं, फिर भी असली में अलग नहीं होते हैं। इसके साथ ही हास्य कवि नवनीत हुल्लड़, सुरेश बैरागी, व्यंजना शुक्ला ने कविता पाठ कर देर रात तक श्रोताओं की खुंब दाद बटोरी। कार्यक्रम की अध्यक्षता अग्रवाल समाज नीमच के उपाध्यक्ष अनिल बंसल काका ने तथा स्वागताध्यक्ष समाजसेवी सत्यनारायण बंसल, चित्तौडगढ थे।

कविता सुनाते कवि मदनमोहन समर।