कंठ और आचरण की भाषा है िहंदी
हिंदीका विरोध नहीं हैै। उसमें तो शब्दावली का भंडार है बस उपयोग नहीं हो रहा। इसी कारण हिंदी सफल नहीं हो सकती। हिंदी को सक्षम करने की जरूरत है। पूरी दुनिया में हिंदी स्थापित है। इसका पोषण संस्कृत ने किया। अनेक लोकभाषा में हिंदी आती है। यह मर नहीं सकती। वह तो कंठ और आचरण की भाषा है। यह बात वरिष्ठ साहित्यकार डा. पूरण सहगल ने कही। वे रविवार को हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में सुबह 10 बजे घंटाघर स्थित आर्य समाज मंदिर पर आर्य समाज के समारोह में मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा अनुवाद से हिंदी बढ़ सकती है। जीवन में विनम्रता जरूरी है। अविनम्र कभी सफल नहीं हो सकता। वाणी मधुर होना चाहिए।
आर्य समाज के प्रधान अर्जुनलाल नरेला ने कहा हिंदी पूर्ण भाषा है। प्रमोद रामावत ने कहा हम तमाम भाषा सीखें लेकिन हिंदी को दिल में रखें। हिंदी को संस्कार स्वीकार करो। संस्कार कोई छीन नहीं सकता वह तो आत्मा से जुड़ा रहता है। संचालन आभार आर्य समाज के मनोज स्वर्णकार ने किया। जगदीश प्रसाद हरित, प्रो. अख्तर अली शाह, किशोर जेवरिया, डॉ. . महिपालसिंह चौहान, डाॅ. सुरेंद्रसिंह शक्तावत, प्रो. रमेश चौहान, लोकेंद्र परिहार ने भी हिंदी भाषा पर विचार रखे। कार्यक्रम में कवि दुर्गेश नागदा, केएल रतावदिया, सुदामा रामनानी, प्रो. आरएल जैन, सुरेशचंद्र शर्मा, चंद्रप्रकाश शर्मा, सुबोध सोनी, भानु दवे, केके गर्ग, एमएल प्रजापति, कंवरलाल पंवार, डाॅ. रश्मि गोयल, अशोक चैौरसिया, एमएम जाधव आदि मौजूद थे।
साहित्य प्रमोद रामावत को आर्य समाज ने हिंदी आर्य र| की उपाधि से सम्मानित किया। उन्हें अभिनंदन-पत्र शाॅल-श्रीफल प्रदान किया। युवा पीढ़ी में हिंदी के प्रति जागरूकता के लिए बीएड के हिंदी विषय में श्रेष्ठ अंक प्राप्त करने पर बंगला 35 निवासी छात्रा शिवांगी गर्ग को सम्मानित किया।
साहित्यकार रामावत हिंदी आर्य र| से सम्मानित
कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्यजन। }फोटो भास्कर