स्वयं को बदलेंगे तभी हो पाएगा हमारा विकास
नीमच | जब तक हम अपने में परिवर्तन नहीं लाएंगे तब तक हमारा विकास नहीं होगा। हमें अपने भावों में परिवर्तन करना होगा। पिता की जूते पुत्र के पांव में आ जाएं तभी आसक्ति का त्याग करना शुरू कर दें।
यह बात मुनि प्रणम्यसागर ने कहीं। शनिवार को दिगम्बर जैन मंदिर में धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा सफाई, शुद्धता जीवन में जरूरी है। परिवार में मोह के कारण किसी को कोई गलत नहीं बताता है। गलती पर ध्यान नहीं देना मोह है। आसक्ति के भाव भी बढ़ते हैं। मोह और प्रेम में अंतर है। मोह के चलते व्यक्ति एक दूसरे को उन्नति के लिए प्रेरणा नहीं दे सकता है, लेकिन जो व्यक्ति प्रेम करता है वह परिवर्तन लाकर भी सामने वाले का विकास चाहता है। संतान को बिगाडने में भी मोह महत्वपूर्ण कारण है। जब व्यक्ति जीवन में परिवर्तन लाएगा तभी वह प्रगति करेगा।
प्रणम्यसागरजी ने कहा