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2017 में चंद्रयान-2 में रोबोट को भेजेंगे और 2020 में अंतरिक्ष यात्री जा सकेंगे
चंद्रयान-2 पर काम चल रहा है। 2017 में इसके साथ रोबोट भेजेंगे। इसके अलावा ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोग्राम 2020 बड़ा मिशन है। इसके बाद हम अंतरिक्ष यात्री को भेजने में सक्षम हो जाएंगे। फिलहाल सैटेलाइट क्षेत्र में तेजी से उभर रहे हैं और जापान, चाइना, यूएसए, रशिया के बाद भारत विश्व के 220 देशों में टॉप-5 में है। भारत द्वारा भेजे आखिरी के 92 सैटेलाइट में से एक भी फेल नहीं रहा जो उपलब्धि है। कई देश हमसे गाइडेंस लेते हैं। हमें पूरा विश्वास है नई पीढ़ी हमसे कहीं आगे जाएगी।
यह बात भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) अहमदाबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के दल ने गुरुवार को मंदसौर यूनिवर्सिटी के एमआईटी कॉलेज में मीडिया से साझा की। इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. दीपक पंड्या, जिग्नेश रावल, जेपी जोशी, सतीश राव ने बताया एमआईटी कॉलेज में 2 दिनी प्रदर्शनी का मकसद विद्यार्थियों में साइंस के प्रति जागरूकता लाना है। कैंपस में लगी विक्रम साराभाई स्पेश प्रदर्शनी को देखने मंदसौर-नीमच जिले के स्कूलों से 2800 छात्र-छात्राएं पहुंचे। शुक्रवार सुबह 10 से शाम 5 बजे तक प्रदर्शनी लगेगी। विद्यार्थियों को चंद्रयान, मंगलयान, रॉकेट साइंस, सौरमंडल से लेकर सैटेलाइट द्वारा भेजी जाने वाली पिक्चरों की प्रक्रिया, तापमान व अन्य जानकारियां दी। शुरू में यूनिवर्सिटी के कुलपति नरेंद्र नाहटा ने कहा दो दिनी प्रदर्शनी विद्यार्थियों के लिए उपयोगी रहेगी। उपकुलपति डॉ. शालिनी गुप्ता, रजिस्ट्रार ओपी सिखवाल, प्रदर्शनी हेड डॉ. अवधेश शर्मा ने स्वागत किया।
इंडिया का गूगल ‘भुवन’- वैज्ञानिकों ने बताया इसरो ने bhuvan.nrsc.gov.in तैयार की है, जो इंडिया का गूगल है। इस साइट पर देश की नगरीय, ग्रामीण आबादी, साक्षरता, महिला-पुरुष अनुपात, शासकीय भूमि, महत्वपूर्ण स्थान, कृषि उपज आदि की डिटेल दी है। हम बेहतर मार्केटिंग नहीं कर पाए।
गैजेट्स व पेटेंट के मामले में देश पीछे क्यों
स्पेस टेक्नालॉजी के मामले में देश काफी आगे है। दूसरे देशों के उपग्रह में हम सहयोग करते हैं, कई उपग्रह पेटेंट हैं। हालांकि यूएसए व अन्य देशों की तुलना में हम गैजेट्स की दिशा में पीछे हैं, टीम काम कर रही है।
इसरो का काम- इसरो अंतरिक्ष पर काम करता है। रॉकेट, सैटेलाइट, रिमोट सेंसर मुख्य है।
इसरो से जुड़ना है तो यह करें विद्यार्थी
इसरो समय-समय पर वैकेंसी निकालता है। इंजीनियरिंग और साइंस क्षेत्र में जरूरत रहती है। जैसे मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक, कम्प्यूटर और एयरो नॉटिकल ब्रांच से कोर्स कर इसरो इंजीनियर बना जा सकता है। इसी तरह वैज्ञानिक बनने के लिए साइंस में मास्टर डिग्री एमएससी जरूरी है।
एमआईटी कैंपस में इसरो के खास मॉडलों व उससे जुड़ी जानकारी पाने भीड़ उमड़ी। प्रमुख मॉडलों में ‘वर्किंग मॉडल ऑफ सेटेलाइट’ रहा, इसके माध्यम से घूमते हुए सैटेलाइट उपग्रह कैसे पिक्चर भेजते हैं, स्थान से जुड़ी डिटेल इसरो सेंटर को मिल सकती है। यहां से एग्रीकल्चर, फॉरेस्ट, फिशरीज व अन्य क्षेत्र पहचाने जाते हैं। इसके अलावा ओसियन सेट-2, डिजास्टर मॉनिटरिंग, रिमोट सेंसिंग ऑर्बिट्स डाटा कनेक्शन एंड प्रोसेसिंग, कम्युनिकेशन सैटेलाइट के बारे में बताया। वहीं एप्पल सेटेलाइट के द्वारा मोबाइल, टीवी सिग्नल पहुंचाने संबंधी प्रक्रिया बताई। विद्यार्थियों को सौरमंडल, रॉकेट साइंस, चंद्रयान, मंगलयान के बारे में बताया। वहां का तापमान, मिथेन और संचालन व्यवस्था से जुड़े सवाल विद्यार्थियों ने किए। वैज्ञानिकों ने जिज्ञासाओं का समाधान किया।
इसरो के खास मॉडल देखने उमड़ी भीड़