व्यवहार से ही पुण्य कर्मों को मिलती है ताकत- प्रणम्यसागर
व्यवहार से ही पुण्य कर्म को मिलती है ताकत,आत्मा शुद्ध है, पाप कर्म उसका मेल है। व्यवहार पुण्य कर्म साबुन के समान है। निश्चय से व्यवहार शुद्ध होता है और व्यवहार शुद्धि से आत्मा शुद्ध होती है। यह बात दिगंबर जैन मुनि प्रणम्यसागर महाराज ने कही।
मंगलवार को सुबह 9.00 बजे दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा पाप-पुण्य भेड़िया हैं हमें पाप-पुण्य से उपर उठकर आत्म कल्याण के लिए शुभ कर्म करना चाहिए। भोग वैभव पाप समान हैं। भोग वैभव पाप कर्म कराते है। आत्मा का स्वभाव शुद्ध निर्मल होता है। पाप को मिटाने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। पुण्य अपने आप मुक्ति का कारण बन जाता है।
मुनिश्री ने कहा भोग विलास में इतना मस्त रहता है और धर्म-कर्म को भूलता जा रहा है। जब रोग आने पर यह वेदना के भय से रोता है कि मेरा यह रोग अच्छा नहीं होगा तो मैं क्या करूंगा।
दिगंबर जैन समाज सचिव प्रमोद गोधा ने बताया प्रवचन प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक आयोजन किए जा रहे है। सुबह 8.45 बजे, तत्वज्ञान चर्चा दोपपहर 3.00 बजे, गुरु भक्ति शाम 6.00 बजे होगी।
दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित मुनि प्रणम्यसागर और सुनते श्रावक-श्राविकाएं।