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धान में लगा जड़ सड़न रोग

7 वर्ष पहले
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रायसेन| जिलेके बाड़ी ब्लाक के ग्राम गुरारिया, विलाड़िया, मगरधा, महेश्वर, बाग पिपरिया, अलीगंज में बोई गई धान में जड़ सड़न रोग के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। यह खुलासा आत्मा परियोजना के अधिकारी दुष्यंत धाकड़, बीटीएम आत्मा, पीएन गुप्ता, एडीओ, जीएस राजपूत, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी एवं कृषि विज्ञान केन्द्र, रायसेन के वैज्ञानिक डॉ. धनंजय कठल, रंजीत सिंह राघव, सुनील केथवास द्वारा धान की फसल का निरीक्षण एवं अवलोकन करने के बाद किया है।

भ्रमण के दौरान पाया गया कि धान की फसल में रसचूसक कीट (माहू, मच्छर) एवं जड़ सड़न रोग की समस्या रही है। इन अधिकारियों ने बताया कि जड़ सड़न रोग में मुख्यत: प्रारंिभक अवस्था में पौधों की पत्तियां हल्की पीली पड़कर सूखने लगती हैं एवं पौधों को उखाड़कर देखने पर जड़ हल्के भूरे रंग की दिखाई देती है एवं गल जाती है। जड़ सड़न रोग के नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम मेन्कोजेब फफूंदनाशक दवा 1 से 1.5 किग्रा की दर से 5 किग्रा यूरिया के साथ मिलाकर प्रति एकड़ भुरकाव करें। धान की फसल में रसचूसक कीट नियंत्रण के लिए थायोमिथाक्जाम 25 डब्ल्यूजी मात्रा 125 ग्राम प्रति हेक्टेयर या एसीटामिप्रिड 20 एसपी मात्रा 125 ग्राम प्रति हेक्टेयर 600 से 700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। कहीं-कहीं क्षेत्रों में धान की फसल में पत्तियों, तना एवं जड़ों पर काले-काले धब्बे दिखाई दे रहे हैं। इस ब्लास्ट रोग के नियंत्रण के लिए ट्राइसाइक्लाजोल 75 प्रतिशत चूर्ण 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर या आइसोप्रोथ्योलेन 40 ईसी 750 मिली प्रति हेक्टेयर दवा को 600 से 700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।