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कीटनाशक छिड़कें, धान फसल को बचाए जड़ सड़न रोग से

5 वर्ष पहले
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क्षेत्र के बाड़ी ब्लाक में लगभग 47 हजार हेक्टेयर में धान की फसल लगाई गई है। वातावरण में उमस और अधिक तापमान से धान के पौधों में जड़ सड़न का प्रकोप दिखाई देने लगा है।

इस संबंध मेें रविवार को एके उपाध्याय उप संचालक कृषि रायसेन के नेतृत्व में डाॅ.स्वप्निल दुबे, प्रदीप द्विवेदी वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केन्द्र नकतरा, जीपी शर्मा सहायक संचालक कृषि रायसेन एवं अरुण रावत वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी बाड़ी द्वारा बाड़ी ब्लाक के नयागांव खुर्द, सिमरोद, बैगनिया, किनगी, कोटपार गनेश, गोल एवं गगनबाड़ा गांव में धान की फसल का अवलोकन एवं निरीक्षण किया।

निरीक्षण के दौरान धान फसल में वेक्टिरियल लीफ ब्लाइट एवं जड़ सड़न का प्रारंभिक प्रकोप पाया गया। निरीक्षण के दौरान क्षेत्र के कृषि विकास अधिकारी सीएस चौधरी, केएस रघुवंशी, केआर पटेल, एसके शर्मा, सीएम साहू, जीएस राजोरे, एएन सक्सेना और एके बागड़ी मौजूद रहे। वहीं गांव कोटपार गनेश में निरीक्षण के दौरान दुष्यंत धाकड़ सहायक संचालक कृषि भी मौजूद रहे।

ऐसे करें बचाव

कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि जड़ सड़न रोग के नियंत्रण के लिए किसान खेत का पानी बदलें, कार्बनजिम और मैकोजेेव का एक से डेढ़ किलो या थायोफिनेट मिथाइल एक किलो को 10 किलो यूरिया अथवा रेत में मिलाकर प्रति एकड़ भुरकाव करें। वहीं ट्रायकोडर्मा विरडी के साथ स्युडोमोनौस फ्लोरेन्स मात्रा एक किलो प्रति एकड़ का छिड़काव करें। किसानों को अपने खेतों में इन रोगों के बचाव के लिए कीटनाशकों का छिड़काव किया जाना चाहिए। इसमें लगभग एक हजार रुपए प्रति एकड़ की लागत आएगी।

अधिकारी कर रहे हैं दौरे
इन दिनों धान में जड़ सड़न की शिकायत मिल रही है। कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों द्वारा दौरे किए जा रहे हैं। दवाइयां कीटनाशक की दुकानों पर उपलब्ध हो रही हैं। अधिकारी भी ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों से मिलकर उन्हें रोग के निदान के लिए जागरूक कर रहे हैं। एके रावत, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी

पत्तियां पड़ने लगीं पीली
निरीक्षण में पाया गया है कि धान के पौधे की जड़ में कत्थई रंग का घेरा बन रहा है। इससे पौधों की प्राकृृतिक अवस्था में बदलाव आ रहा है। इसकी पत्तियां सिरे से पीली पड़ती जा रही हैं। जो कि इस रोग का प्रारंभिक लक्षण है। इसका कारण तापमान में वृद्धि के साथ पानी की कमी होना बताया जा रहा है। पौधे को इस समय पानी की जरूरत होती है, लेकिन मौसम परिवर्तन के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसी कारण धान के पौधे की जड़ में सड़न का रोग लग रहा है।

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