यह भी हैं विकल्प
यह भी हैं विकल्प
ईकोसैन
सेंटरफॉर वॉटर रिसोर्सेस डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट (सीडब्ल्यूआरडीएम) भी ईकोसैन (ECOSAN) के तहत इस दिशा में काम कर रहा है। ईकोसैन टॉयलेट्स के जरिए ग्राउंड वॉटर में होने वाले प्रदूषण को रोकने की तरफ ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। इनमें पानी का उपयोग नहीं होता और मानव अपशिष्ट को इकट्ठा किया जाता है। इसमंे यूरिन को फिल्टर के जरिए अच्छे पानी में और मल को खाद में बदला जाता है। फिर इनका उपयोग कृषि में किया जा सकता है।
बायोडाईजेस्टर
डिफेंसरिसर्च एंड डेवलेपमेंट ऑर्गेनाईजेशन (डीआरडीओ)ने सीवेज ट्रीटमेंट के लिए बायो डाईजेस्टर तकनीक निकाली है, जिसमें सीवेज का पानी पूरी तरह रीसायकल होकर अलग-अलग उपयोग में लाया जा सकता है। जैसे ट्रीटेड फ्लश वॉटर का उपयोग अरबोरीकल्चर (गैर-खाद्यान्न कृषि)और सॉफ्ट वाटर का उपयोग नहाने कपड़े धोने आदि में किया जा सकता है।
कुछमुश्किलें
बेंगलुरु,नोएडा, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और तमिलनाडू कर्नाटक के कई शहरों में ई-टॉयलेट्स इंस्टॉल किए जा चुके हैं और अन्य शहरों में भी इन्हें अपनाने की तैयारी की जा रही है। हालांकि इससे जुड़ी कुछ समस्याएं भी हैं जिन्हें दूर किया जाना जरूरी है -
{इसके प्रसार में सबसे बड़ी बाधा इसकी कीमत है। ई-टॉयलेट के बेसिक मॉडल की कीमत दो लाख रुपए तक है जो स्कूलों के लिए बनाए गए हैं। वहीं एडवांस मॉडल की कीमत 4 से 5 लाख तक है।
{नॉन सोलर पॉवर मॉडल में बिजली सप्लाई होने पर इसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।