आंत्रप्रेन्योर का मंत्र है नेवर गिव-अप
आपके दिमाग में कैसे आया कि मुझे यही करना है?
- पेटीएम में पहले हम टेलीफोन ऑपरेटर के साथ काम कर रहे थे। तो ये समझ में आया कि टेलीकॉम ऑपरेटर और कस्टमर के बीच भरोसा नहीं है। हमने सोचा क्यों न एक पेमेंट प्लेटफॉर्म बनाए, जिसकी पहुंच टेलीकॉम कंपनी जैसी हो और कस्टमर का भरोसा भी हो। जैसे पचास करोड़ कस्टमर टेलीकॉम कंपनी के हैं, उतने हमारे पास हो। सबके पास पेटीएम हो, जैसे सबके पास मोबाइल है। उसका ट्रस्ट और क्वालिटी सुपीरियर हो। इसलिए हमने पे थ्रु मोबाइल (पेटीएम) पर काम शुरू किया।
अपने पहले स्टार्ट-अप के बारे में बताइए?
- 1998 में मैं दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ रहा था। उस समय इंटरनेट बड़ी चीज थी। हमने एक टेक्नोलॉजी बनाई कि आप अपना कंटेट इंटरनेट पर पब्लिश कर सकते हैं। लिविंग मीडिया, एक्सप्रेस मीडिया जैसे पब्लिशिंग हाउस हमारे कस्टमर थे, लेकिन इनकी उम्मीद गड़बड़ा गई, क्योंकि रेवेन्यु नहीं आया।
उस वक्त आप अकेले थे या आपका ग्रुप था?
हम चार दोस्तों का ग्रुप था, बाद में हमने वह कंपनी बेच दी। उस समय इंटरनेट पर विज्ञापन नहीं था और हमें ये समझ में आया कि कंटेट से मोनेटाइजेशन बड़ी समस्या है। मेरा ये मानना था कि इंटरनेट पर रेवेन्यु आना मुश्किल है। फिर 2001 में एसएमएस आया, उन दिनों फ्री एसएमएस था। फिर कुछ-कुछ एसएमएस के लिए पेमेंट आने लगा जैसे डायरेक्ट्री इंफाॅर्मेशन। तो हमने वन97 कंपनी शुरू की। मेरी ये थ्योरी थी कि टेलिकॉम कंपनी कंटेट बेचेगी और हम चार्ज करेंगे।
कभी ऐसा लगा कि स्टार्टअप छोड़ दें और घर जाएं?
- आंत्रप्रेन्योर को नहीं पता चलता कि मैं किस तरफ जा रहा हूं। एक समय था कि मेरे पेरेंट्स ने कहा कि बंद करो और वापस आओ। पहली कंपनी ‘वन97’ में कैश का प्रॉब्लम था। जो आता था लोन में चला जाता था। लोगों से लोन लिए, समस्या ये हो गई कि जो लोग शादी के लिए आते थे, वे कॉल बैक भी नहीं करते थे। पापा ने कहा कि अब बंद करो। पहले मैंने टाला, लेकिन घर वालों ने दो साल बाद फैसला सुनाया कि अब तुम्हें जॉब करना चाहिए। तब मैं तीस हजार की नौकरी ढूंढ़ रहा था। अब कहीं जॉब का विकल्प नहीं था क्योंकि न मैंने एमबीए किया था और न ही कई साल से कंप्यूटर पर काम कर रहा था कि प्रोग्रामर बन सकूं। उन दिनों कॉल सेंटर चलते थे और वहां एडमिन मैनेजर की नौकरी मिल रही थी, उस समय मुझे रोना आ गया।
टर्नअराउंड कैसे हुआ?
- नेवर गिव अप। समय आपको टेस्ट करने के लिए आया है और इसमें हारना नहीं है।
पहली फंडिंग कैसे आई?
- वन97 बनाने के सात साल बाद। 2007 में।
तब तक आपने सरवाइव कैसे किया?
- कस्टमर के पैसे और कर्ज से।
आप स्टार्टअप को क्या सलाह देंगे?
- ये पिक करना कि कौनसा बिजनेस करना चाहिए। ये टेस्ट भी खुद करना होगा कि ये चलेगा या नहीं। कोई और जवाब नहीं दे सकता। सेल्फ रिव्यू जरूरी होता है।
स्टार्ट अप इंडिया इवेंट से क्या होगा?
- आईटी में स्टार्टअप को रेजिड्युएल (बचा हुआ) टैलेंट मिलता है, जबकि हमें चाहिए फ्रंट हैंड टैलेंट। स्टार्टअप में नौकरी के बाद जब आप घर में जाते हो तो सब पूछते हैं, किस कंपनी में नौकरी लगी, हम तो जानते नहीं है। ये खत्म होना चाहिए। आज स्टार्टअप बड़ा काम है। हजारों को काम मिल रहा है। ई-कॉमर्स कंपनियों में एक लाख एम्पलॉई डायरेक्ट होंगे। इनडायरेक्ट व लॉजिस्टिक के कर्मचारी अलग हैं। स्टार्टअप सालाना 5-10 लाख नई नौकरी दे सकते हैं।
फाइनेंशियल व सोशल इंक्लुजन दोनों को आप कनेक्ट होते देखते हैं?
- हां, बिल्कुल। देश का सामाजिक तानाबाना बदल रहा है, अब लोग जाति नहीं पूछते। अब फाइनेंशियली अच्छा करने वालों की कदर है। लोग उनको लोन दे पाएंगे। मेरा कहना है कि क्रेडिट इज वेल्थ क्रिएटर। बड़े लोगों ने लोन पर बड़ी कंपनियां बना रखी हैं। लेकिन छोटे लोगों को लोन नहीं मिलता है।
पेटीएम के लिए आपका क्या प्लान है?
- पहले पेमेंट का बिजनेस किया। अब बैंक की तरफ जाएंगे। फिर बैंक को बढ़ाकर फाइनेंशियल सर्विस की तरफ जाएंगे। पेमेंट, डिपॉजिट, वेल्थ मैनेजमेंट, इंश्योरेंस, म्युचुअल फंड, पूरी तरह से फाइनेंशियल कंपनी बनने का प्लान है। फाइनेंशियल सर्विस में की बजाय दूसरी सर्विस में कंपीटिशन है। बैंक और फाइनेंशियल कंपनियों को देखें, तो वो छोटे कस्टमर को सर्व करना चाहते ही नहीं है। जबकि, चीन में छोटे-छोटे कस्टमर भी अहम होते हैं। बस उनकी सर्विसिंग कॉस्ट ज्यादा होती है। लेकिन मोबाइल द मैजिक इस समस्या को सुलझा सकता है।