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जकरबर्ग के इरादे पर उठते सवाल

6 वर्ष पहले
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फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग की भारत के लोगों को इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने की घोषणाओं पर यकीन करें तो वे खासी प्रभावशाली लगती हैं। दरअसल, अब उन्होंने अपनी कंपनी की मुफ्त इंटरनेट सेवा- internet.org भारत में शुरू भी कर दी है। इसके लिए उन्होंने रिलायंस कम्युनिकेशन्स के साथ अलायंस किया है। सेवा की शुरुआत के मौके पर उन्होंने कहा, ‘भारत में एक अरब से अधिक लोगों की इंटरनेट तक पहुंच नहीं है। ये लोग उन अवसरों का लाभ नहीं उठा पाते, जिन्हें हम अपने लिए सुनिश्चित मानकर चलते हैं।’ जकरबर्ग ने पिछले साल भारत आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। उस वक्त भी उन्होंने एक अरब भारतीयों की इंटरनेट से दूरी का जिक्र किया था और इस माध्यम से उन्हें जोड़ने में सहायक बनने का प्रस्ताव रखा था। उनका दावा है कि उनके इस एप पर कई इंटरनेट सेवाएं मुफ्त दी जाएंगी, लेकिन मुश्किल यह है कि यह एप सिर्फ रिलायंस कम्युनिकेशन्स के नेटवर्क पर काम करेगा। फिलहाल इसका लाभ सिर्फ छह राज्यों के लोग उठा पाएंगे। उनमें भी केवल वे उपभोक्ता, जिनके पास एंड्रॉयड फोन हों और ओपेरा ब्राउजर या यूसी वेब ब्राउजर का इस्तेमाल करते हों। ये ऐसी शर्तें हैं, जो सबको मुफ्त इंटरनेट सेवाएं देने के दावे को संदिग्ध बनाती हैं। गौरतलब है कि ये सारी सेवाएं फेसबुक केंद्रित होंगी। तो सवाल यह उठा है कि जकरबर्ग का मकसद सचमुच इंटरनेट सेवाएं मुफ्त उपलब्ध कराना है अथवा ये पहल फेसबुक और रिलायंस कम्युनिकेशन्स की मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है? फेसबुक और रिलायंस का यह मॉडल नेट-न्यूट्रिलिटी (इंटरनेट तटस्थता) के सिद्धांत के भी खिलाफ जाता लगता है। इस सिद्धांत का अर्थ है कि इंटरनेट की सभी सेवाएं सभी लोगों को समान दर पर, समान गति से और सभी नेटवर्क पर उपलब्ध होनी चाहिए। भारत में अभी नेट-न्यूट्रिलिटी बड़ा मुद्‌दा नहीं है, जबकि पश्चिमी देशों में इस पर जोरदार बहस चल रही है। वैसे दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद कह चुके हैं कि एनडीए सरकार नेट न्यूट्रिलिटी की पक्षधर है। जाहिर है, यह मुद्‌दा देर-सबेर भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के सामने भी आएगा। बहरहाल, जकरबर्ग की कथनी और करनी में फर्क का निहितार्थ यही है कि कारोबारी कंपनियों की हर पेशकश के पीछे असल में मुनाफा ही मकसद होता है। मुनाफे का मकसद होने में भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन देशहित देखना सबसे ज्यादा जरूरी है। विदेशी कंपनियां आमंत्रित करने के जोश में हम यह भूलें।

संपादकीय

}बात पते की

Ãमताधिकार केबुद्धिमानीभरे उपयोग के बिना लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता। अंत: शिक्षा में ही इसकी सुरक्षा है। -फ्रेंकलिनरूजवेल्ट,अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति