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120 वर्ष की बिस्मिल्लाह को बेटों ने छोड़ा बेसहारा
शतायुहोने के बाद भी बेटों ने वृद्ध मां को बेसहारा छोड़ दिया। लेकिन अब बेसहारा वृद्धा को इंसानियत का दुलार मिल रहा है। उनकी देखरेख और खानपान की जवाबदेही मोहल्ले के लोगों ने उठा रखी है। इससे बिस्मिल्लाह खुश तो हैं लेकिन अपनी संतान की बेरुखी से आज भी उनकी आंखें नम हो जाती हैं।
इमामबाड़ा क्षेत्र निवासी 120 साल की बिस्मिल्लाह बाई के पति रमजान बेग पुलिस में हवलदार थे। करीब 50 साल पहले उनकी मौत हो गई। तीन बेटे थे। इनमें आठ साल पहले मंझले बेटे सिकंदर बेग की 75 वर्ष की आयु में जनरेटर गिरने से हादसे में मौत हो चुकी है। जबकि सबसे बड़ा बेटा मुनब्बर बेग (90) अपने परिवार के साथ कोटा में रहता है। तीसरा बेटा अनवर बेग (70) भी परिवार के साथ कोटा रहता है। जबकि चार बेटियों में अनवरी बेग सरवरी बेगम की बीमारी से मौत हो चुकी है। तीसरी बेटी असगरी अपनी ससुराल ग्वालियर में रहती है और सबसे छोटी अख्तरी बेगम सबलगढ़ में रहती हैं। वृद्ध मां का किसी को ख्याल नहीं है। आंखों से लाचार बिस्मिल्लाह अब सहारे से चलती हैं। लेकिन यह सहारा उनके बेटे-बेटियां नाती-पोते नहीं बने, बल्कि मोहल्ले के लोग बन रहे हैं।
बिस्मिल्लाह का अपना पुराना आशियाना तो है। लेकिन परिवार का साथ नहीं होने के कारण स्थानीय लोग उन्हें बुजुर्ग की भांति मानकर देखभाल कर रहे हैं। स्थानीय निवासी आमिल खान, नसीम बानो, शाहिद बाई, रसीद इलाहबादी, जमीला आपा, शहनाज बानो आदि का कहना है कि सबसे अधिक उम्र होने के कारण सबका बिस्मिल्लाह बाई से दुलार है। हर कोई उनके पास बैठता है और बतिायता है। दोनों टाइम हम लोग ही उन्हें खाना देते हैं और बीमार होने पर उनकी तीमारदारी भी करते हैं।
बिस्मिल्लाह बाई भी अपनों की बजाय गैरों से मिल रहे इस दुलार से प्रफुल्लित हैं। उन्हें इस बात का मलाल तो है कि उम्र के इस पड़ाव पर उनके अपने उनके साथ नहीं हैं, पर इस बात का फक्र भी है कि उनके पड़ोसी किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं।
बेटों ने बेसहारा छोड़ी 120 साल की वृद्ध महिला की सेवा करती पड़ौसी महिलाएं।