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आदेश पहुंचने से पहले ही बढ़ गई सरगर्मी

7 वर्ष पहले
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यूजीपीजी कक्षाओं में 2007 में सेमेस्टर प्रणाली शुरु हुई थी। अब प्राध्यापक इसे बंद करने की बात कह रहे हैं। साल में दो बार परीक्षा अन्य कार्यों में व्यस्तता से उनकी छुट्टी की छुट्टी हो गई है। सेमेस्टर प्रणाली से प्राध्यापकों पर पेपर वर्क का लोड बढ़ गया है। क्लास में पढ़ाने के बजाय जानकारी तैयार करने में अधिक समय बीत जाता है। प्राध्यापकों ने बताया कि सतत व्यापक मूल्यांकन की तैयारी, मूल्यांकन सूची तैयार करना, परीक्षा की तैयारी सहित कई काम हैं। कॉलेजों में स्टाफ तो नहीं बढ़ा है, लेकिन विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है। सभी की जानकारी बनाकर विभाग को भी भेजना पड़ती है। इस सबके चलते प्राध्यापक अब बाबू बनते जा रहे हैं।

कार्यालय संवाददाता | सीहोर

कॉलेजस्टूडेंट सेमेस्टर प्रणाली का भविष्य तय करेंगे। जिले के कॉलेजों में 29 सितंबर को वोटिंग होना है। लेकिन अब तक उच्च शिक्षा विभाग से कोई आदेश नहीं आया है। पर कॉलेजों में सरगर्मी शुरु हो गई है।

उच्च शिक्षा विभाग ने सात साल पुरानी सेमेस्टर प्रणाली के भविष्य का फैसला स्टूडेंट्स पर छोड़ दिया है। भास्कर ने चंद्रशेखर आजाद पीजी कॉलेज के विद्यार्थियों से चर्चा की। इसमें कुछ ने इसे बंद करने की बात कही तो कुछ इसे जारी रखने के पक्ष में हैं। सेमेस्टर प्रणाली के पक्ष में विद्यार्थियों ने कहा कि साल में दो बार परीक्षा होने से कोर्स बंट जाता है। इससे पूरी किताब पर ध्यान देने की जरूरत नहीं पड़ती। कमजोर विद्यार्थियों के रिजल्ट में सुधार आया है। कई विद्यार्थियों ने परीक्षा देरी से होना समय पर रिजल्ट जारी नहीं होने से इस बंद करने की बात कही। साथ ही मूल्यांकन में गड़बड़ी से विद्यार्थियों का साल बिगड़ रहा है।

रिजल्टतो सुधरा, लेकिन गुणवत्ता का अभाव : पीजीकॉलेज के प्रोफेसरों से चर्चा के अनुसार कुछ सालों में रिजल्ट तो सुधरा है, लेकिन गुणवत्ता वर्ष मनाने के बाद भी विद्यार्थियों में गुणवत्ता का अभाव है। उनके अनुसार मुख्य परीक्षा में सतत व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) प्रोजेक्ट वर्क के अंक जुड़ने से रिजल्ट में सुधार आया है। साइंस ग्रुप सहित अन्य ग्रुप में पहले से कहीं बेहतर रिजल्ट सुधार हुआ है। इधर सेमेस्टर को वोटिंग की खबर से कॉलेज के विद्यार्थियों में भी खासा उत्साह है।

^वोटिंग को लेकर अब तक विभाग के पास कोई आदेश नहीं आया है। शासन को यूनिवर्सिटी क