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बोर उत्खनन पर प्रतिबंध, किसानों के काम आ रहे हाथ से किए बोर

5 वर्ष पहले
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किसानों को देशी बोर की तकनीक से फसलों को पानी देने का सहारा

राजा परमार | दिनारा

शिवपुरी जिला जल अभाव ग्रस्त घोषित होने के साथ ही जिले में बोर खनन पर प्रतिबंध लग जाने से परेशान किसान देशी तकनीक का सहारा लेकर खेतों में बोई फसल को कुओं में बचे शेष पानी से सूखने से बचाने की जद्दोजहद में जुटे हुए हैं। किसानों द्वारा प्रयोग में लाई जा रही देशी हाथ बोर की तकनीक जहां उनके बजट के अनुसार कम खर्चीली है, वहीं क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप होकर कारगर भी सिद्ध हो रही है। यही बजह कि इस देशी तकनीक का दिनारा क्षेत्र में अधिकांश किसानों द्वारा अपनाकर लाभ उठाया जा रहा है।

हाथ से बोर करने की यह तकनीक सिर्फ कुओं के लिए ही उपयोगी है, जिनमें पानी का स्तर नीचे पहुंचने के कारण कुंआ सूख जाता है। उन कुओं में देशी तकनीक के सहारे हाथ से बोर कर पानी प्राप्त किया जाता है। वर्तमान में उक्त तकनीक किसानों के लिए बहुत ही लाभ कारी सिद्ध हो रही है। जिसकी वजह से किसानों को समूचे क्षेत्र में उत्पन्न सूखे की प्रतिकूल स्थिति से निपटने का हौंसला मिला है। किसान सूख चुके कुओं में हाथ बोर से पानी निकाल कर फसलों की सिंचाई कर रहे हैं।

दिनारा में कुएं में हो रहा हाथ से बोर।

ऐसे काम करती है ये तकनीक
हाथ से बोर करने की देशी तकनीक थोड़ा मेहनत का काम है। इस तकनीक में डीजल इंजन के प्रेशर से पानी की धार पाइप के माध्यम से डाली जाती है तथा दो लोग वर्मा को ताकत से दबाते हुए जमीन में घुमाते हैं और वर्मा नीचे जमीन में धंसता जाता है। एक तरह से यह तकनीकि भी मशीन के सिद्धांत पर ही आधारित है। मशीन में एयर कम्प्रेशर के सहारे वर्मा काम करता है, जबकि देशी तकनीक में पानी से। मशीन में मशीन की ताकत काम करती है, जबकि देशी तकनीक में मानव शक्ति से बोर होता है।

गांव के अनपढ़ किसान ने उपयोग की थी यह तकनीक
कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। यह सूक्ति दिनारा के इन गरीब किसानों पर खरी उतरती है। ग्राम ढांड निवासी कृषक हरनाम सिंह परमार बताते हैं कि लगभग 20-22 साल पूर्व भी क्षेत्र में सूखा पड़ा था और कुओं में पानी की कमी हो गई थी। उस समय आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने सूखे से निपटने के लिए अपने स्वयं के कुएं में प्रयोग के तौर पर हाथ से बोर करने की यह तकनीकी अपनाई थी। अपने स्तर पर ही औजार तैयार किए थे, जो कारगर रही। बाद में गांव के अन्य लोगों ने इस तकनीकी का लाभ उठाया।

10 वर्ष में गांव में कई बोर कर चुके हैं
हाथ से बोरिंग कर लोगों के कुआं आबाद करने के काम में लगे ग्राम ढांड निवासी विनोद जाटव, साहब सिंह जाटव बताते हैं कि इस काम को वह करीब दस, बारह वर्षों से कर रहे हैं, जिससे उनके परिवार की रोजी रोटी चल रही है और दूसरे लोगों का भी भला हो रहा है। उन्होंने बताया कि वो अपने गांव के साथ ही आस पास के गांवों में भी बोर करने जाते हैं। इस तकनीक से गांव में कई बोर कर चुके हैं।

दिनारा में हरियाली, हाथ बोर तकनीक का कमाल
वर्तमान में दिनारा क्षेत्र के ग्राम ढांड व आसपास के गांवों में हो रही फसल की मुख्य बजह हाथ से कराए गए बोर ही हैं जिनसे सिंचाई कर क्षेत्रीय किसान अपनी गुजर कर रहे हैं। इसी तकनीक का कमाल है कि सूखाग्रस्त क्षेत्र के दिनारा के खेतों में हरियाली दिखाई देती है। पुराने कुओं का पानी तो कब का सूख चुका है। इस नई तकनीक के सहारे ही ग्रामवासी खेतीबाड़ी में लगे हुए हैं। कमल सिंह परमार, कृषक निवासी ग्राम ढांड दिनारा

कम पूंजी में हो जाता है बोर

मशीन से ट्यूबवेल उत्खनन कराए जाने की अपेक्षा हाथ बोर करने की तकनीक किसानों को सस्ती पड़ती है और कम पूंजी में ही काम शुरू हो जाता है। हाथ से होने वाले बोर के इस काम में ज्यादा पूंजी की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि दो, तीन लोहे के पाईप तथा एक वर्मा व करने के लिए दो से तीन लोग लगते हैं। एक डीजल इंजन की व्यवस्था कुआं मालिक को करना होती है। हरनामसिंह ने बताया कि पूर्व में इस कार्य का दस रुपए प्रति फीट के हिसाब से मेहनताना मिलता था जो अब अस्सी रुपए फीट मिल रहा है।

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