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अंग्रेजियत के माहौल में ये हैं हिंदी के सिपाही

7 वर्ष पहले
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रतलाम। कोई कुछ भी सोचे, जमाना कितनी ही अंग्रेजी की महत्ता बताए लेकिन इनके जेहन में हिंदी के अलावा कोई और भाषा नहीं रहती। अंग्रेजी के महारथी अंग्रेजियत के माहौल में काम करने के बावजूद इन्होंने हिंदी का सम्मान बरकरार रखा है। इनके लिए हर दिन हिंदी दिवस है। ये हिंदी के सिपाही रोज लोगों को हिंदी में काम करने के लिए प्रेरित करते हैं।

मुझे अंग्रेजी नहीं आती
पेशेसे एलआईसी एजेंट विष्णु बैरागी हिंदी के अच्छे ब्लॉगरों में शुमार हैं। इन्हें व्यंग्यात्मक शैली में लिखने में महारथ है। उनके मित्र को एक दिन अंग्रेजी नहीं आने से हीन भावना हुई। जब उन्हें पता चला तो मन सोचा क्यों कुछ ऐसा किया जाए जिससे हिंदी विशेषज्ञ मित्र को हीन भावना का शिकार होना पड़े। तभी से उन्होंने अपनी शर्ट पर एक बैज लगा लिया। इस पर लिखवाया- ‘मुझे अंग्रेजी नहीं आती।’ बैरागी कहते हैं पत्र लिखने सहित वे सारे काम हिंदी में करते हैं जहां अंग्रेजी अनिवार्य हो। वे मानते हैं यदि सभी ठान लें तो विदेशी भाषा को पछाड़ कर हिंदी बहुत आगे जा सकती है। वे ब्लॉग के अलावा पत्र कविताएं आदि हिंदी में ही लिखते हैं। बैरागी के लिए हर वह शख्स अजीज है जो हिंदी में कार्य करने और इसके प्रचार के लिए संकल्पित है।
अंग्रेजी के महारथी, हिंदी को समर्पित
आर्ट्सएंड साइंस कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में एचओडी रहे प्रो. रतन चौहान का हिंदी प्रेम भी गजब है। जब भी कोई उनसे अंग्रेजी में बात शुरू करता है तो वे हिंदी या ठेठ मालवी में जवाब देते हैं। अंग्रेजी के महारथी होने के बावजूद वे ऐसा करते हैं। सैकड़ों विद्यार्थियों को अंग्रेजी पढ़ा चुके चौहान ने अपना सारा जीवन हिंदी को समर्पित किया। 1970 में जब वे अंग्रेजी के प्राध्यापक बने तब उन्होंने जयशंकर प्रसाद की कामायनी का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद किया था ताकि अंग्रेजी भाषी को हिंदी रचनाओं का महत्व पता चले। वे अब तक हिंदी के कई नाटक लिख चुके हैं। कॉलेज लाइफ में चौराहों पर नुक्कड़ नाटक कर लोगों को हिंदी का महत्व बताते थे। तीस साल से हिंदी के विकास प्रचार में लगे चौहान की 20 से अधिक हिंदी रचनाएं पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे कहते हैं भले ही अंग्रेजी का जानकार हूं लेकिन लोगों को मातृभाषा के प्रति काम करने की ही प्रेरणा देता हूं।

अंग्रेजी की तरफ देखते भी नहीं: दोबत्ती स्थित पेन सेंटर के संचालक महेंद्र पाणोत (जैन) भी हिंदी के सिपाही हैं। एक बार वे वाउचर जमा करवाने गए। उन्होंने वाउचर में हिंदी के अंकों उपयोग किया। यह बैंककर्मी को समझ नहीं आया। उसने भुगतान करने से ही मना कर दिया। इसके लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी और बैंक में हिंदी में काम हो, इसके लिए प्रयास किए। एमकॉम तक पढ़े पाणोत अंग्रेजी का उपयोग करना तो दूर वे उसकी तरफ देखते तक नहीं। दुकान पर भी वे बिल में हिंदी के ही अंक उपयोग करते हैं। कई बार ग्राहक अंग्रेजी के अंक वाला बिल मांगते हैं, तो साफ मना कर देते हैं। कहते हैं बिल तो हिंदी में ही मिलेगा। मोबाइल पर भी वे हिंदी का ही उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया वे दुकान पर हिंदी को बढ़ावा देने वाले संदेश लगाएंगे।

हिंदी दिवस पर विशेष : लोगों को हिंदी में ही काम करने की देते हैं प्रेरणा।