पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • \"कल्याण को चुनें, अकल्याण से दूर रहें\'

\"कल्याण को चुनें, अकल्याण से दूर रहें\'

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
आगपानी से बुझती है, घी से नहीं। हमारे कार्य अनंत कर्मों को जलाने की क्षमता रखते है। सम्यकदर्शन द्वारा देखता है। सम्यकत्व द्वारा श्रद्धान करता है, और ज्ञान के द्वारा जीव जानता है। यह बात वर्णी भवन मोराजी में विराजमान आचार्यश्री विभवसागर महाराज ने बुधवार को प्रवचनों में कही। उन्होंने कहा कि ज्ञान के दोष दूर नहीं हो सकते। ज्ञान का कार्य आने वाले दोषों को दूर करने का है। ज्ञान चारित्र में दोष जाये। हित की प्राप्ति और अहित का परिहार ज्ञान के द्वारा ही संभव है। जीव के साथ अनादिकाल से जो बुराईयां, दोष, विकृतियां अवगुण लगे हुये है। ज्ञान उन सभी को दूर कर देता है। ‘बिन जाने तैं दोष गुणन को कैसे तजिये गहिए’कल्याण को चुने अकल्याण से दूर रहे। हित को चुने अहित से दूर रहें। आचार्यश्री ने कहा कि सम्यकदृष्टि को सम्यकज्ञान हो जाये तो समस्त दोष स्वयंमेव दूर हो जाते है। भगवान आदिनाथ के लिये तीन ज्ञान थे पर वह तैरासी लाख पूर्वाग्ड़ तक देव रहे, नहीं निकल पाये। ज्ञान में सम्यक शब्द अज्ञान को हटाने के लिए लगाया गया है। मोह रहित जीव के सम्यकदर्शन,ज्ञान, चारित्र होते है। कर्मबंध का अभाव वही कर सकता है जो अपनी आत्मा के गुणो की उपासना करता है। निज गुण की आराधना करने पर तीर्थंकर की आराधना हो जायेगी। जो निजगुण की आराधना करता है, वह कर्मों को दूर कर देता है। ज्ञान का कौन कितना उपयोग कर रहा है। यह जानना चाहिए। धनी व्यापारी अपने सम्पूर्ण धन का दान कर देता है, विद्वान एक या दो प्रतिशत अपने ज्ञान का उपयोग कर पाते है। ज्ञानी का पूरा ज्ञान चारित्र रूप में नहीं ढ़ल पाता। आत्मा के दोषों को दूर करो, गुणों की आराधना करो, सभी अवगुण दूर हो जावेंगे।