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कर्मों का क्षय होने पर दुखों का क्षय हो जाता है : आचार्यश्री
सागर. कर्मोंसे छुड़ाने का उपदेश जिनवाणी मां देती हैं। नेमिकुमार ने पशुओं को मुक्त किया। इस संसार में सर्वज्ञ की दृष्टि में तुम कैद दिखाई दे रहे हो, उससे छूटने का उपाय निज गुण आराधना है। सम्यकदृष्टि पुरुषार्थ करता है। ज्ञान की क्षमता वाला कम पुरुषार्थ करता है। चारित्र के साथ में अधिक पुरुषार्थ करता है। यह बात वर्णी भवन मोराजी में विराजमान आचार्यश्री विभवसागर जी महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि निर्जरा सावधानी और बंध असावधानी पूर्वक होता है। सम्यकत्व का पालन करने वाले असंख्यात गुणी निर्जरा करते है। गृहस्थ की निर्जरा गज निर्जरा है। धीर पुरुष सम्यकदर्शन, ज्ञान, चारित्र, धारण करने वाले अपनी साधना से विचलित नहीं होते। जिनके तन पर स्वेद तथा मन में खेद नहीं होता, वे धीर कहलाते है। धैर्य होने पर सिद्धियां होती है। जो स्वभाव के अनुकूल रहता है वह कूलता नहीं।
जो जीव कर्म के उदय काल में समता रखता है वह बंधता नहीं। गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, जय और चारित्र ये संवर के कारण है, इनमें आता हुआ कर्म रुकता है। कर्मों का क्षय होने पर दुखों का क्षय हो जाता है।श्रावक क्रिया को तथा साधु अभिप्राय को देखता है। र|त्रय की साधना के लिए आहार दिया जाता है। सामयिक प्रतिक्रमण स्वाध्याय के लिए मोक्ष साधना करो। आहार लेकर साधना नहीं करना कर्ज है। बंध ही कर्ज है। संवर कर्ज को चुकाता है। अत: संवर की क्रिया अपनाओ।