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पापों को नष्ट करने आलोचना की क्रिया करना जरूरी

7 वर्ष पहले
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निजआत्मा ही परमात्मा है। आत्मा कभी संसार भ्रमण तथा कभी निर्वाण की ओर प्रस्थान करती है। र|त्रय के तीन गुण आत्मा में परिणमन करते हैं। तभी वह आत्मा मोक्ष को जाती है। सम्यकदर्शन एवं सम्यकचरित्र के शुद्ध तथा पच्चीस दोषों से रहित आत्मा अत्यंत निर्दोष है। परिणामों की निर्मलता प्रतिक्रमण से होती है। अत: पापों को नष्ट करने के लिए प्रत्याख्यान, आलोचना आदि की क्रिया करना जरूरी है। यह बात वर्णी भवन मोराजी में विराजमान आचार्यश्री ने बुधवार को धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि कारण के त्याग से कार्य का त्याग हो जाता है। साधन कार्यरूप नहीं कारण रूप है। आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति कार्य है। आस्त्रव बंध से बचना संवर, निर्जरा करने का उद्देश्य है। मोक्ष कार्य है मोक्ष मार्ग कारण है। सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान शुद्ध तथा सम्यकचारित्र सुप्रसिद्ध होना चाहिए। कषाय का समय तथा शुक्लध्यान के समय अलग अलग है, पल पल के परिणाम जुदा-जुदा होते हैं। इसलिए एक पल देखकर निर्णय नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन महत्वपूर्ण है। क्रिया रहित भाव तथा भाव रहित क्रिया निरर्थक है। मारीच ने भगवान आदिनाथ की दिव्य ध्वनि सुनी थी वह अभिमान में आकर समवशरण से बाहर चला गया और उसने 363 मतों की स्थापना कर दी। आत्मा के भीतर के पल-पल के विचार में अंतर आता जाता है। उपशम का मान उदय में जाता है। मिथ्यादृष्टि समवशरण में नहीं आता। अनंत पदार्थ अनंतकाल से बंधे हैं। निज आत्मा ही मेरा उपादेय है। आत्म कल्याण के लिए मैं स्वयं के द्वारा स्वयं को ही पुरुषार्थ करना है। जब ऐसी स्थिति बनेगी।