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15 मिनट में एक हो गया 15 सालों से बिखरा परिवार

7 वर्ष पहले
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सागर। लोक अदालत में सिर्फ बिजली, पानी के मामले निपटाए गए, बल्कि दांपत्य जीवन में घुली कड़वाहट में मिठास भी घोल दी। सालों से चली रही दूरियों को चंद मिनट में नजदीकियों में बदल दिया। बंडा तहसील के पिड़रुआ गांव में रहने वाले हरिराम सारवान का विवाह नेहानगर मकरोनिया निवासी भाग बाई के साथ हुआ था। हरिराम फौज नौकरी करते रहे और भाग बाई घर के कामों में हाथ बंटाती रही। शादी के कुछ सालों तक सब कुछ ठीक ठाक चला। फिर दोनों के बीच मनमुटाव शुरू हो गया। परिस्थितियां ऐसी बनी कि दोनों अलग-अलग रहने लगे। करीब 15 साल तक यह सिलसिला चलता रहा।
57 साल के हरिराम ने भी नहीं सोचा था कि लोक अदालत उसके दांपत्य जीवन में फिर से खुशियां लौटा देगी। शनिवार सुबह भाग बाई एवं हरिराम अपने परिजनों के साथ जिला न्यायालय पहुंचे। यहां जिला एवं सत्र न्यायाधीश एचपी सिंह ने दोनों को अपने सामने बिठाया। कुछ मिनट तक दोनों के दुख-दर्द बांटे। दांपत्य जीवन का महत्व समझाया। नतीजा यह हुआ कि दोनों ने गिले शिकवे भुलाकर फिर एक-दूजे के हो गए। अदालत में ही दोनों ने एक-दूसरे को पुष्पहार पहनाए और मुंह मीठा कराया। न्यायाधीश ने भी दोनों को राजीखुशी विदा किया। हरिराम का कहना था कि रिटायरमेंट के बाद का जीवन अच्छे से गुजरेगा।
दो साल से जुदा-जुदा थे, अब एक हो गए : नरयावली कस्बे की 24 वर्षीय कौशल्या बाई जन्म से गूंगी और बहरी है। वीरेंद्र कुशवाहा ने अपनी जीवन संगनी बनाया। कौशल्या ने दो बच्चों को जन्म दिया। गृहस्थी अच्छी खासी चल रही थी। दो साल पहले पारिवारिक विवाद के चलते दोनों जुदा-जुदा हो गए। मामला न्यायालय पहुंचा। लोक अदालत में न्यायाधीश योगेश कुमार गुप्ता ने दोनों को समझाइश दी। कौशल्या बाई को समझाने में बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ा। आखिरकार के बीच राजीनामा हो गया।

एक साल बाद हुआ गलती का अहसास : कानपुर उत्तरप्रदेश के डॉ. धीरेंद्र सिंह की शादी दो साल पहले सागर निवासी नेहा कुशवाहा से हुई थी। बाद में पता नहीं कि दोनों के बीच क्या हुआ और एक साल से दोनों अलग-अलग रह रहे थे। लोक अदालत ने दोनों के बीच सुलह कराई। इसी तरह बैजनाथ लोधी एवं उनकी पत्नी रानी के बीच समझौता कराया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश एचपी सिंह ने कहा कि लोक अदालत के माध्यम से होने वाले निर्णयों में दोनों पक्षों की विजय होती है, जिससे वैमनस्यता में कमी आती है। विवाद होना एक स्वाभाविक नीति है। न्यायालयीन निर्णय से रंजिश खत्म नहीं होती, लेकिन लोक अदालत से समझौता हो जाता है। क्षमा हमेशा प्रसन्नता देती है।
लोक अदालत : दोबारा बांधी दांपत्य जीवन की डोर, कई परिवारों के विवाद आपसी सुलह से सुलझे ।
(जिला एवं सत्र न्यायाधीश के सामने एक-दूसरे को मिठाई खिलाते दंपती। )