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बिन गुरु के जीवन शुरू नहीं होता : आचार्यश्री

7 वर्ष पहले
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सुननामोक्ष नहीं, सुनाना मोक्ष नहीं, बल्कि जो भीतर की सुनकर सुनाएगा वह कल्याण कर सकता है। भीतर वाला भीतर की सुनता है। आत्मा को आत्मा मानना और देह को देह मानना तत्व का यथार्थ श्रद्धान हैं, जो सुनने के पहले सुन लेता है उसे दूसरों की नहीं सुनना पड़ती, निज स्वरूप की पहचान भेद ज्ञान से होती है। सुनने सुनाने से कुछ नहीं होता। यह बात आचार्यश्री विभवसागर महाराज ने सोमवार को वर्णी भवन मोराजी में धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि स्वानुभूति रसास्वादन आनंदमय है। जैसे कुआं रातभर में भर जाता है। उसी प्रकार साधु भी अपने भावों से भर जाता है। आत्मा के भीतर ज्ञानरूपी जल प्रवाहित हो रहा है। आत्माज्ञानमय तथा परम सत्य है। आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में गुरु का होना आवश्यक है बगैर गुरु के जीवन शुरू नहीं होता। शास्त्रों में शास्त्रों की महिमा कम तथा गुरुओं की महिमा अधिक है। बूंद सागर में जाती है तो अपने अस्तित्व को खो देती है। गुरुजनों के श्रम की बूंद श्रमण बनाती है। गुरू यदि भीतर बैठा रहे तो अहंकार का गुरू प्रवेश नहीं कर सकता। गुरू निग्र्रंथ के बीज है। अहंकार सहित ज्ञान विनाश कर देता है। स्वयं का ज्ञान स्वयं के विनाश का कारण बन जाता है। वक्तव्य कला आने पर भेद ज्ञान के अभाव में बोला गया वक्तव्य सारहीन है। सम्यकदर्शन विशुद्धि रखता है सम्यकज्ञानी को मान नहीं होना चाहिए। बूंद सागर में समा गई तो उसका अस्तित्व समकालीन हो जाता है। सम्यकदश्रन हो गया तो आत्मा में प्रवेश हुआ जानना चाहिए। गुरु के चरणों की रज ही आचरण है। स्वरूप का दर्शन होने पर रूप का भेद नहीं पाएगा। भीतर के भेदज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति सुलभ है। आर्यिका ओमश्री माताजी ने कहा कि बाह्य दृष्टि रखने पर भगवान दिखाई नहीं देते पर अंतरंग दृष्टि होने पर अर्हंत दिखाई देते है। बाह्य दृष्टि सविकल्प है और अंतरंग दृष्टि निर्विकल्प है। निर्विकल्प स्थिति का होना मोक्ष है और मोक्ष पूर्ण सुखमय है।