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- संसार के जीवों से प्रेम करना ही सबसे बड़ी पूजा है : डॉ. शास्त्री
संसार के जीवों से प्रेम करना ही सबसे बड़ी पूजा है : डॉ. शास्त्री
सागर | संतको पहचानने में भूल नहीं करनी चाहिए। संत किसी भी परिवेश में हो सकते हैं। राजा परीक्षित ने समीक मुनि जैसे विशुद्ध संत को ढोंगी मानकर उनके गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया, परिणामस्वरूप सात दिन में ही मृत्यु का श्राप लगा। रामायण में कालनेमि जैसे राक्षस के सुवेश को देखकर प्रताप भानू ने उसे असली महात्मा समझकर उसी के अनुसार कार्य किया परिणामस्वरूप परिवार के सहित राक्षस बनना पड़ा। यह बात खेल परिसर के बाजू वाले मैदान में चल रहे संगीतमय श्रीमद भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन डॉ. श्याम सुंदर पाराशर शास्त्री ने कही। उन्होंने कहा कि हमें शिक्षा जहां से भी मिले ले लेना चाहिए। संसार के जीवों से प्रेम करना ही सबसे बडी पूजा है। दूसरों का अपमान करने के उद्देश्य से किया गया विश्वास रहित यज्ञ भी कभी पूर्ण नहीं हो सकता। उसमें श्रृद्धा रूपी सती को देह त्याग करना पड़ता है। मां चाहे तो अपने संस्कार से बच्चे ध्रुव, प्रहलाद, विवेकानंद, भगतसिंह बना सकती है। क्योंकि बालक की प्रथम गुरू मां ही है। कथा के पहले आचार्य संतोष गौतम ने कहा भागीरथी गंगा गौ मुख से जब निकलती है तब छोटी धारा के रूप में दिखाई देती है, लेकिन जब गंगासागर में मिलती है तब स्वरूप विशाल होता है। इसी तरह हमें परमात्मा के चरणों में भक्ति करते हुए प्रभु को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। श्रीमद भागवत का मूल पाठ राजेश पचौरी ने किया। हारमोनियम पर राधे नागर, आर्गन पर मुकेश नायक, तबला वादन लक्ष्मीनारायण एवं संजय ठाकुर, पैड पर बंटी शर्मा एवं बांसुरी पर जुगलकिशोर ने संगत की। सुबह पूजन पंडित हरि महाराज एवं शिवनारायण गोस्वामी शास्त्री ने किया।
सागर . खेल परिसर के बाजू वाले मैदान में चल रही श्रीमद भागवत कथा में शुक्रवार को श्रद्धालु उमड़े।