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10 बड़े शहरों में गए मगर चार पीढ़ी से गांव से जीवंत संपर्क

5 वर्ष पहले
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सागर जिले की बीना तहसील का यह धानोरा गांव है, जहां के लोग दिल्ली से मुंबई के बीच करीब दस शहरों में बसे हैं मगर अपने गांव से अटूट रिश्ता कायम रखा है। ये सब यहां के संयुक्त श्रीवास्तव परिवार की शाखाएं हैं। कभी तीन हजार एकड़ की जमींदारी वाले इस परिवार की चौथी पीढ़ी के लोग बड़े शहरों में गए मगर गांव को भूले नहीं। करीब सौ साल पहले यह गांव अयोध्या प्रसाद श्रीवास्तव की जमींदारी में आया था।

उनके पास तब तीन गांवों की जमींदारी में करीब तीन हजार एकड़ जमीन थी। उनके बेटे हनुमान प्रसाद श्रीवास्तव इलाके के प्रसिद्ध ज्योतिषी थे। अब चौथी पीढ़ी में इस परिवार की 15 शाखाएं हैं। दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, गंज बासौदा, विदिशा, भोपाल से लेकर मुंबई तक इनके परिवार बसे हैं। कारोबार और नौकरियों के लिए निकले जरूर मगर गांव से रिश्ता कायम रखा। आज भी इन परिवारों की करीब 600 सौ एकड़ जमीन है, जहां साल में दो फसलें लेते हैं। चौथी पीढ़ी में 30 साल के रौनक श्रीवास्तव दिल्ली में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। वे कुछ समय अमेरिका में भी रहे। इनमें उनके हिस्से की सौ एकड़ जमीन है। वे कहते हैं, हमने अपने परदादा की जमींदारी के किस्से पापा से सुने। उनकी शिकायत है कि अगर गांव में बुनियादी सुविधाएं बेहतर हों तो गांव से बाहर गए लोग स्थाई रूप से वापस भी आ सकते हैं। भोपाल में बसे मनोज श्रीवास्तव बताते हैं कि 1955 में पहली बार एक सदस्य बैंक मैनेजर बने थे। वे गांव से बाहर जाने वाले पहले सदस्य थे। मगर उनका मन नहीं लगा और नौकरी छोड़कर लौटे, गांव में ही रहना पसंद किया। यहां के सरपंच बने। सौ साल पुरानी गांव की मजबूत हवेली मशहूर है। एक वही इमारत है, जो पीढ़ियों के बाद भी शान से खड़ी है। वह हमारी शानदार विरासत है। यह परंपरा बनाई गई कि हरेक परिवार अपनी नई पीढ़ी को इससे जोड़कर रखेगा। यह जरूरी होगा कि दुनिया में कहीं भी हों गांव को अलविदा नहीं कहेंगे। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि अामतौर पर शहरों में जमने के बाद लोग अपनी खेतीबाड़ी बेचकर चले जाते हैं। आसपास के ज्यादातर गांवों की यही कहानी है मगर धानोरा एक ऐसा उदाहरण है, जहां श्रीवास्तवों की चारों पीढ़ियां गांव से जुड़ी रहीं हैं और सबके सुख-दुख में सहभागी रहीं।

चलो, गांव चलें
धानोरा, जिला सागर

यह गांव ऐतिहासिक रुप से महत्वपूर्ण है। एक टीले पर पुरासंपदा बिखरी हुई, जिसे सहेजने का काम श्ुरु किया गया है।

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