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गढ़ाकोटा रोड पर गलगल टौरिया में है जामवंतजी का मंदिर
आपनेरामायण के प्रमुख पात्र भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मणजी, हनुमानजी के सैकड़ों मंदिर देखे-सुने होंगे। शायद लंकापति दशानन रावण के मंदिर के बारे में भी सुना हो। लेकिन यह बहुत मुमकिन है कि आपने कभी रामायण के एक और महत्वपूर्ण पात्र ऋक्षराज जामवंतजी के मंदिर के बारे में देखा सुना हो। चलिए हम बता देते हैं जामवंतजी का मंदिर कहां है। आपको आश्चर्य होगा कि यह मंदिर शहर से मात्र 25 किलोमीटर दूर गढ़ाकोटा रोड पर गलगल टोरिया नामक पहाड़ी पर है। धार्मिक पर्यटन के लिए शहर के पास यह अच्छा स्थान हो सकता है।
रेलकी पटरियों के लिए हुई खुदाई में मिली थी प्रतिमा : इसमंदिर की व्यवस्थापन कमेटी के सदस्य करणसिंह पटेल के अनुसार इस मंदिर का इतिहास 150 साल से ज्यादा पुराना है। उनके अनुसार किंवदंती है कि सन 1860 के दशक में जब सागर-कटनी रेलवे ट्रैक तैयार हो रहा था। तभी खुदाई के दौरान एक मजदूर को स्वप्न आया कि अमुक जगह पर खुदाई करो। वहां श्री हनुमानजी और श्री जामवंतजी की मूर्तियां गड़ी हुई हैं। खोदने में दोनों मूर्तियां प्रकट हो गई। उन्हें पास ही एक पेड़ के नीचे विराजमान कर दिया गया। यह स्थान बाद में मंदिर का रूप लेता गया। आज यहां प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु सपरिवार आते हैं और भगवान राम के इन दो प्रमुख सहायकों की पूजा करते हैं।
मंदिर के पीछे से दिखती है पूरी मालगाड़ी
धार्मिकपर्यटन के अलावा यह मंदिर इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि इसके पीछे से सागर-कटनी ट्रैक से गुजरने वाली ट्रेन को एक नजर में पूरा देखा जा सकता है। पूरी रेल को देखने की दीवानगी का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि कई लोग रेल के आने-जाने के समय ही मंदिर पहुंचते हैं, ताकि वह दर्शन करने के साथ-साथ बच्चों को पटरियों पर सरपट दौड़ती रेल का विहंगम दृश्य दिखा सकें।
अक्सर क्षेत्र में रीछ डेरा डाले रहते हैं : लोगोंका कहना है कि जिस तरह हनुमानजी के मंदिरों के आसपास बंदर मौजूद रहते हैं। उसी तरह यहां अक्सर रीछ और भालू देखे गए हैं। पिछले साल ही दो रीछ यहां करीब तीन महीने तक घूमते रहे, लेकिन उन्होंने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। इस मंदिर से वर्षों से जुड़े अमिताभ चौबे का कहना है कि यहां आकर एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति होती है।
सागर. गढ़ाकोटारोड पर गलगल टौरिया में भगवान श्री जामवंतजी की प्रतिमा एवं उनक