व्यक्ति का दुख समझें उसका दुख दूर होगा
मनुष्य को जीवन विकसित होने के लिए ही मिलता है। अगर कठिनाई नहीं होगी तो हम विकास कैसे करेंगे। ऐसे तो हम सदा ही तमस में पड़े रहेंगे। दरअसल, हम भौतिकवाद के इतने अधीन हैं कि जीवन का उद्देश्य भूल चुके हैं। हम युवा पीढ़ी को बचपन से सही रास्ता नहीं दिखा पाते हैं। चीजें खरीदने के लिए कमाने में इतने मशगूल हैं कि जरा-से झटके में हड़बड़ा जाते हैं। युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति देखने में आती है, जबकि यह जीवन कर्मभूमि है और हमें हर मोड़ पर संघर्ष करना जरूरी है।
जब भी कोई अवसादग्रस्त मानसिकता से खुद को हानि पहुंचाने के बारे में सोचता है, तब यह बहुत जरूरी है कि हम उसकी मानसिक स्थिति को समझकर सहारा दे। अवसाद में व्यक्ति हमेशा उदास रहता है। हर वक्त उसे बहुत ज्यादा थकान रहती है, किसी भी चीज़ में मन नहीं लगता और निराशा उसे हमेशा घेरे रहती है। वह लोगों से अलग रहना पसंद करता है और उसे जीवन का कुछ उद्देश्य समझ में नहीं आता। उसे लगता है कि उसकी मन की स्थिति कभी नहीं बदलेगी, इसलिए व्यक्ति खुद को हानि पहुंचाने के बारे में विचार करने लगता है। इसका एक और कारण है, किसी के प्रति क्रोध। जब व्यक्ति को ऐसा लगता है कि उसके प्रियजनों ने उसे छोड़ दिया है या फिर उसका दृष्टिकोण नहीं समझ पा रहे हैं तब उसके मन में बहुत क्रोध भर जाता है। पर वो इस क्रोध को जाहिर नहीं कर पाता और मन ही मन उसका क्रोध बढ़ता है। वह सोचता है कि अपने आपको नुकसान पहुंचाकर अपने प्रियजनों में अपराध बोध की भावना जगाएगा।
चाहे कारण कोई भी हो, लेकिन जो भी खुद को हानि पहुंचाने का निश्चय करता है, वो कहीं न कहीं जीना चाहता है, अगर उसे भावनात्मक सहारा और सही मार्गदर्शन मिलें। किसी दूसरे के दुख को महसूस करना बहुत मुश्किल है। जब भी कोई व्यक्ति अपनी पीड़ा व्यक्त करे, हमें उसकी पीड़ा महसूस करनी चाहिए। ऐसा करने पर व्यक्ति को लगता है कि वह अकेला नहीं है। खुद को हानि पहुंचाने वाले व्यक्ति को इसी एक तिनके का सहारा काफी होता है। इसके साथ-साथ युवाओं को सत्य को पहचानना चाहिए। सत्य यह है कि हमारा शरीर, व्यक्तित्व और पहचान सब भ्रम है, जिस प्रकार हम सबने झूठे आकार ले रखे हैं। जैसे जाति, धर्म, लिंग, रंग-रूप, भाषा, प्रांत, आदि। जब तक हम इनके अधीन रहते हैं, हम दुखी रहते हैं, लेकिन जैसे ही हम यह समझ जाते हैं कि हम सब एक ही महासागर की बूंदें हैं, सब दुख खत्म हो जाता है।
डॉ. पुलकित शर्मा
साइकोलॉजिस्ट, दिल्ली
अच्छी सोच