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सैनिक के शव का दर्शन तीरथ जैसा होता है...

5 वर्ष पहले
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6 दिन तक बर्फ में दबे रहे हनुमनथप्पा का इलाज के चौथे दिन दिल्ली में निधन
वो जी उठा था, हम ही बचा नहीं पाए
दिल्ली में सलामी के लिए हनुमनथप्पा का शव बरार स्क्वेयर में रखा गया। वहां तीनों सेना प्रमुखों ने उन्हें सलामी दी।

कवि हरिओम पंवार ने यह कविता भास्कर के पाठकों के लिए भेजी...

जिन बेटों ने पर्वत काटे हैं अपने नाखूनों से,

उनकी कोई चाह नही है दिल्ली के कानूनों से।

जो सैनिक सीमा रेखा पर ध्रुवतारा बन जाता है,

उस कुर्बानी के दीपक से सूरज भी शरमाता है।

गर्म दहानों पर तोपों के जो सीने उड़ जाते हैं,

उनकी गाथा लिखने को अंबर छोटे पड़ जाते हैं।

उनके लिए हिमालय कंधा देने को झुक जाता है,

कुछ पल को सागर की लहरों का गर्जन रुक जाता है।

उस सैनिक के शव का दर्शन, तीरथ जैसा होता है,

चित्र शहीदों का मंदिर की मूरत जैसा होता है।

उन आंखों की दो बूंदों से, सातों सागर हारे हैं,

जब मेंहदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं।

नई दिल्ली| ‘तुम जिंदगी से जीते नहीं, पर लड़े तो थे, ये बात कम नहीं कि, तुम जिद पर अड़े तो थे। गम रहेगा कि बचा न सके तुम्हें, वर्ना हमें बचाने, वहां तुम खड़े तो थे।

शहीद लांस नायक हनुमनथप्पा को ऐसी ही श्रद्धांजलि पूरे देश ने दी। सेना का उसूल है- आखिरी दम तक हार नहीं मानना। 33 साल के हनुमनथप्पा ने यही उसूल निभाया। 6 दिन तक सियाचीन में 35 फीट बर्फ के नीचे दबे रहे, पर मौत को पास न आने दिया। पर डॉक्टर उन्हें बचाने में नाकाम हो गए। गुरुवार दोपहर 11.45 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हालत बुधवार रात से ही नाजुक हो गई थी। कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। सुबह दिमाग में ऑक्सीजन लेवल घटने लगा तो बचने की आस टूट गई। हनुमनथप्पा का शव कर्नाटक के पैतृक गांव ले जाया गया है। शुक्रवार को उनका अंतिम संस्कार होगा।

शहीद हनुमनथप्पा

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