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आहार के बिना साधना और उसके त्याग के बिना समाधि संभव नहीं है : मुनिश्री

4 वर्ष पहले
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वर्णी भजन मोराजी में रयणसार ग्रंथ की वाचना चल रही है। मुनिश्री विभंजन सागर मुनिराज ने बताया कि मुनिराज आहार ग्रहण करना नहीं चाहते पर फिर भी संयम के निमित्त से आहार ग्रहण करते हैं। जिससे संयम का पालन अच्छी तरह से होता रहे। साधु तप करने के लिए आहार करते हैं और तप करने के लिए आहार का त्याग भी करते हैं, क्योंकि बिना आहार के शरीर में शक्ति नहीं रहती है। साधुजन साधना करने के लिए आहार लेते हैं और समाधि के निमित्त आहार को छोड़ते है।

आहार किए बिना साधना संभव नहीं है और आहार त्याग किए बिना समाधि संभव नहीं है। मुनिश्री ने बताया कि ध्यान के निमित्त से भी साधु आहार ग्रहण करते हैं। आहार करने से शरीर की स्थिरता बनी रहती है और मन की चंचलता रुक जाती है और इसी से ध्यान संभव है। क्योंकि निर्विकल्प ध्यान के बिना मोक्ष संभव नहीं है।

मुनिश्री ने कहा कि जो साधु क्रोध से, कलह से, याचना पूर्वक, संक्लेश से, रुष्टता से आहार ग्रहण करता है वह साधु, साधु नहीं है। साधु तो सदैव समता भाव रखता है। समता के अभाव में साधु की साधुता नष्ट हो जाती है। भूखे रहना अच्छा है पर मांगकर खाना अच्छा नहीं है। संकलेशता पूर्वक आहार करना कि इसमें नमक नहीं, मीठा नहीं ऐसा बोलकर परिणाम खराब करना है। रुष्टता पूर्वक आहार करना चेहरे को विकृत करके आहार करना कहलाता है, ये साधु का लक्षण नहीं हैं। ऐसे स्वभाव बाले साधु, साधु नहीं है।

जिनकी चर्चा और चर्या में अंतर है ऐसा साधु धर्म को बदनाम करता है। कलंकित करता है जो अपनी मनमानी प्रवृत्ति करता है। इसीलिए आचार्य कहते हैं कि जो साधु उपर्युक्त प्रवृत्ति को छोड़कर समता भाव में रहकर अपनी साधना करता है वही मोक्ष मार्ग को प्रशस्त कर अपनी आत्मा का कल्याण करके मोक्ष प्राप्त करता है।

मुनिश्री विभंजन सागर।

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