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सम्यक दर्शन को पाना दुर्लभ है : आचार्यश्री
सागर. सम्यकदर्शन को पाना दुर्लभ है। उसकी सुरक्षा और भी दुर्लभ है। जीवन में वीतरागतारूप परिणति होना चाहिए, क्योंकि जीवन का ध्येय वीतरागता में निहित है। यह बात वर्णी भवन मोराजी में विराजमान विभव सागर महाराज ने प्रवचन में कही। उन्होंने कहा कि रागरूपी आग ने अभी तक जलाया तथा चिंता करते-करते सब कुछ राख हो गया। अनावश्यक तत्वों को सुनकर श्रद्धा चली जाती है। यह चार कारणों से होता है। मिथ्या मार्ग में उत्साह, प्रशंसा, अज्ञात, मोह। जब यही चारों सम्यक दर्शन मार्ग में जाएं तो सम्यक दिशा होने पर श्रद्धा सम्यक दर्शन को पुष्ट करते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि स्वर्ग मोक्ष का रास्ता दिखाने के लिए जिनवाणी एवं देव, शास्त्र, गुरु की आवश्यकता है। दया बिना धर्म नहीं है।