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वही जमीन अिधसूचित करें, जिसका उपयोग हो सके

7 वर्ष पहले
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भासं. उज्जैन. सिंहस्थके दौरान साधु संत शिप्रा के पास ही पड़ाव लगाना पसंद करते हैं। दूर दी गई जमीन हमेशा खाली रहती है, जबकि प्रशासन को वहां भी मूलभूत सुविधाओं के इंतजाम करने पड़ते हैं। सिंहस्थ के बाद किसानों की जमीन खराब हो जाती है। पड़ाव स्थल बनाने के लिए किसानों के कुएं, नलकूप, पेड़-पौधे नष्ट होते हैं। इससे काफी नुकसान होता है। जरूरी यह है कि प्रशासन वही जमीन अधिसूचित करे, जिसका उपयोग हो सके।

यह कहना है पूर्व महापौर और 1980, 92 और 2004 में सिंहस्थ भूमि आवंटन समिति के प्रमुख रहे पं. राधेश्याम उपाध्याय का। उपाध्याय ने भास्कर से सिंहस्थ अधिसूचना में 4 हजार हेक्टेयर जमीन लेने के मामले में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा अधिसूचना जारी करने के पहले कलेक्टर को चाहिए वह पिछले सिंहस्थ में भूमि आवंटन समितियों के सदस्यों और अधिकारियों के साथ चयनित भूमि को लेकर चर्चा करे। मौके पर जाकर स्थिति देखें। जब तक पिछले सिंहस्थ की जानकारी नहीं होगी, तब तक 2016 के लिए भूमि आवंटन सही तरीके से संभव नहीं। उपाध्याय का कहना है कि 2016 सिंहस्थ के लिए 4 हजार हेक्टेयर जमीन को अधिसूचित करने का प्रस्ताव है। इसमें इंदौर रोड, चिंतामन रोड, मंगरोला, सदावल, मौजमखेड़ी, भैरवगढ़, चक कमेड़ तक की जमीन शामिल है। आगररोड पर भी दूर तक जमीन का चिह्नांकन किया गया है। पिछले अनुभव बताते हैं कि साधु संत अपने पिछले पड़ाव स्थल पर ही पड़ाव डालेंगे। पर्व और शाही स्नान पर इन साधु संतों को तड़के 6 बजे से यात्रा शुरू करनी पड़ती है। इसलिए वे नदी के पास ही पड़ाव चाहते हैं। पूर्व महापौर का कहना है 2004 में 2150 हेक्टेयर जमीन अधिसूचित की थी, जबकि मेला 1400 हेक्टेयर में ही लगा था। उक्त अधिसूचित जमीन को 2016 के लिए लिया जा सकता है। 2016 में अधिकतम 2000 हेक्टेयर में मेला लगेगा। सबसे पहले 2004 का भूमि आवंटन नक्शा लेकर जमीन चिन्हित करें और कितने हिस्से में पड़ाव थे और कितनी जमीन खाली थी, इसका पता लगाकर 2016 की तैयारी करें। अनुभवी लोगों के मार्गदर्शन में काम होगा तो दिक्कत नहीं आएगी। साधु संतों के अखाड़ों से भी मशविरा किया जाना चाहिए।

पं. राधेश्याम उपाध्याय