मरने के बाद दो जिंदगियां रोशन कर गए
शिवाजीपार्क उज्जैन के रहने वाले रामचंद्र सातल राठी ने जीते-जी तो समाजसेवा की ही, मरने के बाद भी वे दो जीवन को रोशन कर गए। सातल के निधन पर परिवार ने नेत्र बैंक के जरिए उनका नेत्रदान कराया। इंदौर एमवाय अस्पताल को जैसे ही आंखें मिली, उन्होंने झाबुआ सनावद के रहने वाले एक महिला पुरुष को यह आंखें लगाकर उनकी अंधेरी जिंदगी को रोशनी दे दी।
1973 में कोलकाता से उज्जैन आए सातल ने श्री सिंथेटिक्स फैक्टरी में नौकरी के साथ गरीबों की सेवा की। माहेश्वरी मारवाड़ी समाज में भी उन्होंने सेवा प्रकल्प शुरू किए। लायंस क्लब उज्जैन महाकाल को जीवित रहते ही उन्होंने घोषणा पत्र भरकर नेत्रदान कर दिए थे ताकि मरने के बाद शरीर के अंग दूसरों के काम आए। 71 वर्ष की आयु में हाल ही में उनके निधन पर उनकी अंतिम इच्छानुसार पुत्र प्रदीप परिवार के अन्य सदस्यों ने सातल के नेत्रदान कराए। लायंस क्लब उज्जैन के नरेंद्र राठी के सहयोग से लक्ष्मीनारायण शर्मा ने क्लब की ओर से उनके निवास जाकर सातल के नेत्र लिए और उन्हें प्रत्यारोपण के लिए इंदौर एमवाय अस्पताल भिजवाया। अस्पताल के नेत्र बैंक ने भी इस पुनीत कार्य में देर नहीं की और उसी दिन सातल के दोनों नेत्र झाबुआ के निरंजन परिहार और सनावद की पूनम पेंढारकर को लगाकर उन्हें जीवन में नई रोशनी दी।
दुर्घटना बीमारी ने छीन ली थी आंखें
54वर्षीय निरंजन झाबुआ ग्राम पंचायत में कार्यरत हैं। बस दुर्घटना में कांच लगने से उनकी आंखें चली गई थी। चिकित्सकों ने रोशनी नहीं आने को कहा तो वे टूटकर साधारण जीवन जी रहे थे। इधर सनावद की 31 वर्षीय पूनम स्कूल में टीचर थी। टाइफाइड में आंखों की रोशनी चली गई। दोनों ने आंखों के लिए नेत्र बैंक काे आवेदन दे रखा था। उज्जैन के सातल की आंखें लगने के बाद दोनों खुश हैं और नए जीवन की शुरुआत की है। इसका जिक्र उन्होंने अस्पताल को लिखे धन्यवाद पत्र में किया है।
उज्जैनमें नेत्रदान : 18 साल में 2487
नेत्रबैंक उज्जैन के अध्यक्ष बद्रीलाल अग्रवाल ने कहा 1996 में लायंस क्लब ने उज्जैन में नेत्र बैंक की शुरुआत की तथा 18 साल में अब तक 2487 जोड़ी नेत्र दान कराए। जिला अस्पताल परिसर स्थित नेत्र बैंक में नि:शुल्क घोषणा पत्र भरकर कोई भी व्यक्ति आंखें दान कर सकता है।
रामचंद्र सातल