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नर्मदा के लिए तो पहल उज्जैन में शिप्रा को मयखानों से मुक्ति आखिर कब...?

5 वर्ष पहले
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मंत्री, सांसद, विधायक और महापौर किसी ने नहीं की मुख्यमंत्री से बात
भास्कर ने शहर की जनता के प्रति जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों से सिर्फ दो सवाल को जवाब पूछे। पहला शिप्रा के आसपास शराब दुकानें नहीं हो, इसके लिए क्या उन्होंने मुख्यमंत्री से बात की है? दूसरा सवाल - वे इन दुकानों की नीलामी रुकवाने के लिए क्या करेंगे? जनप्रतिनिधियों के ये जवाब रहे-

मेरा व्यक्तिगत विचार है शिप्रा किनारे से भी शराब दुकानें हटना चाहिए। सीएम से इस बारे में पहले बात हुई है। सरकार सर्वे करा रही है। सर्वे के बाद ही इस बारे में कोई निर्णय हो सकेगा। - पारस जैन, ऊर्जा मंत्री व विधायक उज्जैन उत्तर

मैं चाहता तो हूं शिप्रा किनारे से भी शराब दुकानें हटना चाहिए। अभी सीएम से इस संबंध में कोई बात नहीं हुई है। मैं विषय का अध्ययन करने के बाद ही कुछ कह सकता हूं। - डॉ. चिंतामणि मालवीय, सांसद

इस संबंध में मुख्यमंत्री को पहले पत्र भेज चुके हैं। मंगलवार को भोपाल जाना है। यदि सीएम से भेंट हुई तो इस बारे में चर्चा भी करूंगा। फैसला सरकार के हाथ में है। - डॉ. मोहन यादव, विधायक उज्जैन दक्षिण

शिप्रा किनारे से शराब दुकानें हटाने के लिए परिषद में प्रस्ताव लाया जाएगा। नौ फरवरी के पहले तो परिषद की बैठक नहीं होगी। दुकानों के नवीनीकरण की प्रक्रिया रोकने के लिए पत्र जरूर लिखूंगी। - मीना जोनवाल, महापौर

सात दुकानें कम हुईं तो सरकार को फर्क नहीं पड़ेगा पर खुली तो जनता जवाब मांगेगी
दो नदियां। नर्मदा और शिप्रा। दोनों के प्रति अटूट आस्था। सरकार एक लेकिन नजरिया अलग-अलग। एक नदी को सरकार शराब से कोसो दूर रखना चाहती है तो दूसरी के मुहाने पर भी शराब दुकानों से कोई मतलब नहीं। एक के लिए बिना आंदाेलन सरकार पहल कर देती है तो दूसरी के लिए जनता की आवाज को भी नजरअंदाज। तुलना के बिंदु और भी हैं पर महत्वपूर्ण हैं सवाल। सवाल है जनता की भावना का। सवाल है एक नदी के प्रति आस्था का। सवाल है जनप्रतिनिधियों की शहर के प्रति जिम्मेदारी का। सवाल और भी हैं लेकिन इससे भी जरूरी है जवाब जो जनता मांग रही है। बेहद शांतिपूर्ण ढंग से। कहीं हस्ताक्षर कर। कहीं विचार-विमर्श कर। एक मंत्री हैं जिनके वक्तव्यों से स्पष्ट हो रहा है कि ‘ जो सरकार करे वह सही’। सांसद के लिए अब भी शिप्रा किनारे शराब दुकानें नहीं होना ‘अध्ययन का विषय’ है। विधायक ‘सरकार के भरोसे’ हैं। महापौर को पत्र लिखने के लिए भी किसी ‘उचित समय’ का इंतजार है। जबकि अभी सभी के पास सुअवसर है पवित्र (नगरी की) भावना का सम्मान करने का। सात शराब की दुकानें कम हो जाएंगी तो खजाने में नहीं आने वाले कुछ करोड़ रुपए से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर यदि जनता के ‘मन की बात’ नहीं सुनी और शराब दुकानें नहीं हटी तो..? जवाब जनप्रतिनिधियों के पास ही है।

भास्कर संवाददाता | उज्जैन

आबकारी विभाग व 1 अप्रैल से शुरू होने वाले नए कारोबारी साल के लिए जिले में शराब दुकानों की नीलामी की तैयारी कर रहा है। इनमें वे दुकानें भी शामिल हैं जो शिप्रा नदी के आसपास हैं। तय कार्यक्रम के मुताबिक 9 फरवरी को नीलामी होगी। लोगों की मांग के बावजूद न तो प्रशासन और न ही नेताओं ने इस बारे में कोई ठोस पहल की है जिससे शिप्रा के आसपास शराब दुकानें न हो। नर्मदा की तरह शिप्रा किनारे से भी शराब दुकानें हटाने के लिए न तो मंत्री और न ही विधायक और सांसद ने अब तक मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से बात की है। महापौर ने भी कोई पहल नहीं की है।

नर्मदा के पांच किमी दायरे में शराब दुकानें हटाने का ऐलान हाल ही में मुख्यमंत्री ने किया है। 1 अप्रैल से नर्मदा के आसपास की करीब 56 दुकानें बंद हो जाएंगी। शिप्रा के आसपास तो महज सात दुकानें हैं। इन दुकानों से सरकार को मात्र 52 करोड़ रुपए का राजस्व मिलता है।

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