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प्रकृति-संस्कृति से मेल होने के कारण पनपती है विकृति: आचार्यश्री
व्यवस्थाओंका जब संक्रमण हो जाता है तब वहां अव्यवस्था हो जाती है। ऐसे ही प्रकृति और संस्कृति से जब मानव जुड़ नहीं पाता है तो विकृति की आकृति हमारे सामने होती है। उपरोक्त उद्गार संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज ने रविवारीय प्रवचन में शीतलधाम में व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि परिभाषा में मत उलझो। धर्म की पहचान वहीं होती है जहां दया-करुणा का वास होता है। मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो परिभाषाओं में उलझा रहता है। बाकी जीवों में यह उलझन नहीं हुआ करती। लोग कहते हैं कि समय बदल गया। समय नहीं बदलता। वह अपनी गति में भी परिवर्तन नहीं लाता। वर्तमान की तुलना में आप भूत को ज्यादा महत्व देते हो। भारत में वर्तमान में आपके साथ जो रह रहा है उसका महत्व कम करते हो और जब वह चला जाता है तो उसको श्राद्ध के माध्यम से याद करते हो।
उन्होंने कहा कि भाषा की उलझन कही नही है। जब गीत हम बोलते हैं अथवा सुनते हैं तो व्यक्ति विभिन्न प्रदेशों में रहने वाला है फिर भी वह उस गीत के बोल में,लय को पहचान कर उसमें अपना विलय कर लेता है। चार वाक्य आकृति, प्रकृति, विकृति और संस्कृति इन चारों कृतियों के माध्यम से भगवान श्रीआदिनाथ स्वामी ने पाठशालाओं के माध्यम से मनुष्यों एवं पशुओं को समझाया। पशु तो प्रकृति के साथ चले और विकृति को ग्रहण नहीं कर पाए लेकिन मनुष्यों ने प्रकृति का साथ भी छोड़ा और संस्कृति के साथ भी नहीं चले। इसी कारण विकृति की आकृति हमारे सामने हैं।
मनुष्य, मनुष्य की भाषा नहीं समझना चाहता लेकिन पशु आपकी भाषा को समझते हैं। सिंह जैसा मांस भक्षी जीव भी अपनी प्रकृति को पहचान कर उसमें परिवर्तन कर लेता है किंतु मनुष्य तो प्रकृति से जुड़ पाया और ही संस्कृति से।
देश भर से आए जैन धर्मावलंबी
सकलदिगंबर जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि रविवार को मप्र, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात सहित संपूर्ण मध्य भारत क्षेत्र से जैन मिलन के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित हुए थे। बाहर से विशेष बसों तथा ट्रेनों से आने वालों का तांता लगा हुआ है। रविवार को प्रवचन के दौरान पंडाल पूरी तरह भरे रहे।