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हिंदी में हों पाठ्य पुस्तकें: आचार्यश्री
अंग्रेजों की नीतियों ने संपन्न राष्ट्र को धन, शिक्षा संस्कृति से कमजोर किया
भारतको विश्व में पुन: अग्रणी देखना चाहते हो तो सबसे पहले अपनी मातृ भाषा में कानून, भौतिकी, आयुर्वेद प्रबंधन आदि का ज्ञान करवाना होगा। उक्त उद्गार आचार्य विद्यासागर महाराज ने गुरुवार सुबह शीतलधाम में व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि आज के युवा अंग्रेजी के प्रति आकर्षित है। इसका मुख्य कारण उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जो शिक्षा प्रदान की जा रही है वह मातृभाषा में होकर अंग्रेजी भाषा में हैं। अंग्रेजों की नीतियों ने इस संपन्न राष्ट्र को धन, शिक्षा संस्कृति से कमजोर किया है। जब हम इतिहास उठाकर देखते हैं तो भारत को सोने की चिडिय़ा कहा जाने वाला भारत वर्तमान में कही नजर नहीं आता। इसलिए इस देश की अर्थनीति और शिक्षानीति में भारी बदलाव की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा जीवन का वह पवित्र संस्कार है जो हमें मानवतावादी सिद्धांतों पर चलना सिखलाता है। शब्द ज्ञान नहीं हैं बल्कि ज्ञान प्राप्ति का साधन है। जो ज्ञान हमें विदेशी संस्कृति की ओर ले जाए वह भावनात्मक नहीं हो सकता। आज विद्यार्थियों को कला, संगीत सांस्कृतिक धरोहरों का ज्ञान के बराकर कराया जा रहा है। वर्तमान की शिक्षा प्रणाली कत्र्तव्यों और संस्कारों से परे हैं। जबकि भारतीय संस्कृति में सम्यक ज्ञान का विशेष महत्व है। वर्तमान में जो आचरणहीनता देखी जा रही है उसका मुख्य कारण भी हमारा झुकाव पाश्चात्य संस्कृति की ओर होना बताया जा रहा है। विद्यार्थियेां को 1885 के पूर्व की जानकारी अवश्य प्रदान करना चाहिए। इससे भारत के स्वर्णिम अतीत को जान सके एवं भारत पुन: भारत बन सके।उन्होंने इंडिया शब्द को हटाने पर जोर देते हुए कहा कि भारत के प्रत्येक नागरिक को इस आंदोलन से भावनात्मक रूप से जुडऩा होगा। भारतीय संस्कृति,भारतीय विरासत को आगे लाना होगा। तभी हम अपनी शिक्षा अपने गुण और अपनी बुद्धि से भारत को निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा पाएंगे।