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एक पैर के सहारे सैकड़ों बच्चों का सहारा बनी

6 वर्ष पहले
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विदिशा। परिस्थितियां कितनी भी वितरीत क्यों ना हों, लेकिन यदि हौसले से काम किया जाए तो सफलता में कोई बाधा नहीं बनती। कुछ ऐसी ही मिसाल पेश की है शहर की बेटी अर्चना खेड़ा (38) ने। करीब 10 साल पहले एक ट्रेन हादसे में अर्चना का दाहिना पैर कट गया था। उसके बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। बाद में अर्चना ने आर्टिफीशियल पैर लगवाने के बाद एक शिक्षक के रूप में अपने माधवगंज स्थित निवास पर ही स्कूली छात्र-छात्राओं को मार्गदर्शन देना शुरू किया।
इससे ना सिर्फ अर्चना की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और वह आत्मनिर्भर बन गई बल्कि अपने हुनर के सहारे सैकड़ों युवाओं को रोजगार दिलाने में सहायक बनी। अर्चना के पढ़ाए हुए सैकड़ों छात्र-छात्राएं आज देश की नामी-गिरामी कंपनियों और प्रतिष्ठानों में नौकरी कर रहे हैं। वे जिंदादिली की एक जीती-जागती रोशनी बन गई हैं।
उन्होंने परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर वक्त के सांचे में ढलने के बजाय वक्त के सांचे को ही बदल दिया है। अर्चना अब घर का पूरा कामकाज संभालती हैं और किचन में भी हाथ बंटाती हैं। हाट-बाजार के काम भी एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही करती हैं। किताबें पढ़ने की शौकीन हैं तथा टी. रंगराजन की पुस्तक अप्रेषित पत्र से उन्हें बहुत प्रेरणा मिली है।