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भावों की अभिव्यक्ति के लिए भाषा की आवश्यकता नहीं

7 वर्ष पहले
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जीवनसंघर्ष मय है हम उसमें हर्ष चाहते हैं। भावों की अभिव्यक्ति के लिए भाषा की आवश्यकता नहीं भावों की आवश्यकता होती है। वह संकेत किसी भी भाषा में हो सकता है। उक्त उद्गार आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने रविवारीय प्रवचन में शीतलधाम में व्यक्त किए।

हिंदी दिवस पर आयोजित विशेष प्रवचन में उन्होंने कहा कि जब से अंग्रेज भारत में आए उन्हेांने शिक्षा के नाम पर अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया। इससे भारतीय शिक्षा एवं क्षेत्रीय शिक्षा प्रभावित हुई। हिंदी की अवनति होती चली गई। उन्होंने भारतीय शिक्षा एवं उसके मूल को पीछे की ओर धकेल दिया। आज जो कुछ भी हमे बताया जा रहा है वह बहुत ही थोड़ा है। ज्ञान का विकास आगे देखने से नहीं होता बल्कि पीछे मुड़कर देखने से होता है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा मात्र संकेत है। शिक्षा के उद्देश्य की ओर हमारी दृष्टि ही नहीं है। शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य मात्र परीक्षा हो गया है। जीवन के विकास के लिए जो आवश्यक था उसे गौण कर दिया गया है। उसके स्थान पर आजीविका का साधन बना दिया है। शिक्षा का उद्देश्य नीति और न्याय में निपुणता आना चाहिए, आध्यात्म में निपुणता आना चाहिए जबकि वर्तमान की शिक्षा का उद्देश्य मात्र नौकरी रह गया है। स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा का विस्तार तो बहुत हुआ लेकिन नागरिकता का अभाव हुआ। मात्र भारत में रहने से आप भारतीय नागरिक नहीं बन गए। नागरिक अलग वस्तु है नागरिकता अलग वस्तु है।

उन्होंने कहा कि शब्द हमें अर्थ की ओर ले जाता है जो शब्द भी है और संकेत भी। धन की ओर नहीं धर्म की ओर अपनी दृष्टि करो। धन का अर्थ पहले गोधन, गज धन, बाज धन, अनाज धन तथा जीवित प्राणियों की ओर संकेत होता था आज कल नोट को ही धन कहा जाने लगा है। आज की शिक्षा धन केंद्रित शिक्षा है इसमें बदलाव की आवश्यकता है। भारतीय इतिहास में इतना अधिक विज्ञान था कि उससे आपको संपूर्ण तत्व की जानकारी हो जाया करती थी। आज उसका कुछ अंश ही आप लोगों के सामने हैं।

विदिशा। शीतलधाम में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।