नई दिल्ली. दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा तीन सीटों पर सिमट गई तो कांग्रेस खाता भी नहीं खोल सकी। आखिर, अरविंद
केजरीवाल की पार्टी को इतनी बड़ी सफलता कैसे मिली? केजरीवाल के नेतृत्व के अलावा पार्टी के कुछ जाने पहचाने और कुछ अनजान चेहरे भी इस जीत की वजह बने। कई ऐसे लोग थे, जो पर्दे के पीछे काम कर रहे थे। जो चेहरे गुमनाम रह कर काम कर रहे थे, उनमें राघव चड्ढा, अंकित लाल, आशीष तलवार, नागेंद्र शर्मा, दीपक वाजपेयी, दुर्गेश पाठक, दिलीप पांडे, आतिशी मरलेना, पंकज गुप्ता, गुल पनाग शामिल हैं
( इन लोगों के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें)। इन लोगों की मेहनत के अलावा 10 अहम कारण भी आप को 67 सीटें जितवाने में अहम रहे।
केवल पार्टी की नाम ही आम आदमी पार्टी नहीं रखा, बल्कि खुद भी ठीक वैसे ही नजर आते हैं और लोगों को यही अंदाज भा गया। हैरानी की बात यह है कि उन्हें समाज के हर वर्ग का समर्थन मिला, चाहे इलीट क्लास हो या यूथ क्लास। माइनॉरिटी सेक्शन हो या फिर स्लम वोटर्स। हर कोई केजरीवाल के साथ खड़ा नजर आया। भीड़ में आम आदमी की तरह केजरीवाल का अंदाज और वीआईपी कल्चर से दूर रहना उनकी खासियत है।
2. भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े रुख की छवि
‘आप’ के पक्ष में एक और बड़ी बात जाती है और वह है भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका कड़ा रुख। पुलिस की हफ्ता वसूली, एमसीडी में करप्शन या फिर व्यापारियों को सेल टैक्स अफसरों से होने वाली परेशानी, ‘आप’ ने अपनी पिछली 49 दिनों की सरकार में इन पर सख्ती से रोक लगाई थी। यही कारण था कि बीजेपी का बिजनेस क्लास और पारंपरिक वोट बैंक ‘आप’ के साथ हो गया।
3. मोदी के अपराजेय रिकॉर्ड को तोड़ना
2014 के लोकसभा चुनाव और फिर कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत के बाद ये माना जाने लगा था कि बीजेपी और मोदी के विजय रथ को रोकना बेहद कठिन है। दिल्ली वालों की सोच अलग थी। उन्हें लगा कि रोजाना के कामों के लिए ‘आप’ बीजेपी से ज्यादा कारगर विकल्प है। बीजेपी के कुछ नेताओं की हेट स्पीच और उस पर मोदी की चुप्पी ने लोगों का उनसे मोहभंग कर दिया। सुरक्षा कारणों से ही सही, मोदी लोगों से दूर हो गए हैं। वहीं, केजरीवाल लोगों के काफी करीब हैं। यह फैक्टर काम कर गया।
4. बेदी कार्ड नहीं चला
चुनाव के ऐन पहले केजरीवाल के मुकाबले बीजेपी ने
किरण बेदी को उतारकर मास्टर स्ट्रोक खेला, लेकिन यह बुरी तरह फेल रहा और खुद बेदी भी चुनाव जीत गईं। माना ये जा रहा है कि बीजेपी की अंदरूनी गुटबाजी के कारण भी मामला खराब हुआ। लेकिन इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि केजरीवाल के मुकाबले किरण बेदी का जादू कहीं नहीं चला। बीजेपी की लोकल लीडरशिप 16 साल से सत्ता पाने का इंतजार कर रही थी, लेकिन हाईकमान ने बेदी को उतारकर उनके सपनों पर पानी फेर दिया। बीजेपी को आखिर में ये दांव बहुत महंगा पड़ा।
5. हर वर्ग का समर्थन
दिल्ली में सभी तरह के वर्ग हैं। माना जा रहा है कि मिडल और अपर क्लास ने भी ‘आप’ को सपोर्ट किया। स्लम और लोअर मिडल क्लास तो उसका कट्टर समर्थक है ही। कांग्रेस का वोट बैंक माने जाने वाला स्लम और माइनॉरिटी वोट बैंक पूरी तरह ‘आप’ के पास शिफ्ट हो गया। बिजली और पानी पर ‘आप’ के वादे काम कर गए।
6. अल्पसंख्यक वोट
एक्सपर्ट मानते हैं कि माइनॉरिटीज का लगभग पूरा वोट ‘आप’ की तरफ शिफ्ट हो गया। आम तौर पर इस वोट बैंक को कांग्रेस के फेवर में माना जाता रहा है। दूसरी ओर, दिल्ली में कुछ चर्च पर हाल ही में हमले हुए थे, इसके बाद ईसाई समुदाय बीजेपी और केंद्र सरकार से नाराज था। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस वोट बैंक ने भी ‘आप’ को ही समर्थन दिया।
7. पूर्वांचली वोट बैंक
मूल रूप से यह बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए लोग हैं और दिल्ली की कम से कम पांच ऐसी सीटें हैं, जिन पर यह वर्ग नतीजे तय करता है। हैरानी की बात यह है कि ‘आप’ ने इस वर्ग के लोगों को 14 जगहों से टिकट दिए, जबकि बीजेपी ने केवल तीन जगह से। माना जा रहा है कि बीजेपी की हार में यह कारण बेहद अहम है। पार्टी के भीतर भी इस भेदभाव को लेकर नाराजगी महसूस की जा रही थी।
8. बाबुओं की नाराजगी
माना जा रहा है कि केंद्र में नई सरकार आने के बाद यहां का सरकारी बाबू वर्ग काफी नाराज था। हालांकि, इसकी वजहें सही नहीं कही जा सकतीं। मोदी ने प्रशासनिक कर्मचारियों की लेटलतीफी पर अंकुश लगाने के लिए बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम लागू कर दिया, जिसमें सभी कर्मचारियों को सुबह 9.30 पर ऑफिस पहुंचना पड़ता है या फिर उनकी सैलरी काटी जाती है। मोदी सरकार ने रिटायरमेंट की सीमा भी दो साल घटा दी। इन्हीं कुछ कारणों से ये वर्ग ‘आप’ के करीब पहुंच गया।
9. चुनाव में देरी से ‘आप’ को फायदा
लोकसभा चुनाव के पहले से ही देश में बीजेपी और मोदी की लहर थी, लेकिन केंद्र में सरकार बनाने के बाद भी बीजेपी ने
दिल्ली विधानसभा चुनाव को लंबे समय तक टाला। बीच में मिले 9 महीने के समय का लाभ साफ तौर पर ‘आप’ ने उठाया और अपने कार्यकर्ताओं को न सिर्फ संगठित किया, बल्कि उनमें जोश भी भरा।
10. केजरीवाल पर हमले
बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ने आम आदमी पार्टी के नेता
अरविंद केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले किए। इन हमलों का असर बिल्कुल उलटा हुआ और वोटर्स ने उनके पक्ष में सहानुभूति दिखाई।
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