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सेना का नया लड़ाका-बैल्जियम शेफर्ड डॉग

8 वर्ष पहले
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मेरठ. हमारी सेना इन दिनों एक नया लड़ाका तैयार कर रही है। विदेशी है ये। बैल्जियम शेफर्ड डॉग। जल्दी ही इसकी तैनाती भी कर दी जाएगी। खूबी ये है कि हथियार देखते ही ये हमला कर देता है। किसी का पीछा करना हो तो भी इसका मुकाबला नहीं। अमेरिकी कमांडो फोर्स नेवी सील्स में शामिल इस डॉग का ओसामा के खिलाफ ऑपरेशन में भी इस्तेमाल किया गया था। ये पहली बार है जब देश में सोल्जर डॉग को हमलावर के रूप में तैयार किया जा रहा है। अब तक इनका इस्तेमाल बचाव अभियान, चौकसी या छानबीन में ही होता रहा है। मेरठ के आरवीसी डॉग ट्रेनिंग स्कूल में ये लड़ाके तैयार हो रहे हैं। हमलावर के रूप में तैयार होने वाले डॉग्स में बैल्जियम शेफर्ड के साथ जर्मन शेफर्ड ब्रीड भी शामिल है।
बढ़ जाती है सफलता की संभावना : ये ऐसा सैनिक है जिसके पास बंदूक नहीं है। लेकिन इसकी मौजूदगी से ही जवानों की सफलता की संभावना 70 प्रतिशत बढ़ जाती है। जबकि कैज्युल्टी की संभावना 80 प्रतिशत कम हो जाती है।
जवानों को तो प्रमोशन, मेडल और छुट्टी चाहिए होती है। लेकिन ये 24 घंटे 12 महीने ड्यूटी पर रहते है। सुबह 5 बजे उठना। फिर पीटी। लौटकर मालिश और ग्रूमिंग। शाम को 5 बजे से ट्रेनिंग। खाने में रोज आधा किलो मीट, ब्रेड, चावल, आटा और सब्जी दी जाती है। खाने और दवाइयों पर हर महीने 5 से 10 हजार रुपए खर्च आता है।
किसी सैनिक ऑपरेशन के लिए इन्हें भी सैनिक की तरह तैयार किया जाता है। सिर पर कैमरा लगाया जाता है। अंधेरे, कोहरे, धुंए और आग के बीच इनका प्रदर्शन लाजवाब रहा है। हालांकि, इन्हें कोई रैंक तो नहीं दी जातीं। लेकिन शाबाशी की थपकी के अलावा मैडल और सर्टिफिकेट देने का प्रावधान है। पहचान के लिए हर डॉग के भीतर एक माइक्रोचिप लगाई जाती है, जिस पर उनका यूनिक इलेक्ट्रॉनिक नंबर दर्ज होता है।
एनएसजी अपने डॉग को और सुरक्षित बनाने जा रही है। उनके लिए बुलेट प्रूफ जैकेट मंगाए गए हैं। ये उनकी छाती और पेट को ढंककर रखेगा। अभी तक सिर्फ अफगानिस्तान और इराक में तैनात अमेरिकी डॉग बुलेट प्रूफ जैकेट पहनते हैं।
लगभग दस साल तक ये सर्विस में रह सकते हैं। और इनके करियर का पूरा रिकॉर्ड भी रखा जाता है। रिटायरमेंट के बाद इन्हें कैंप में ही रखा जाता है, लेकिन ऑपरेशन पर नहीं ले जाया जाता।
इन डॉग्स का करियर बेदाग रहे, इसकी जिम्मेदारी इनके ट्रेनर पर होती है। कहीं-कहीं गड़बड़ भी हो जाती है। छत्तीसगढ़ पुलिस की दो डॉग्स सीमा और लीजा का करियर उस वक्त बैकफुट पर चला गया जब वे गर्भवती हो गईं। इनकी सुरक्षा का ख्याल न रख पाने वाले ट्रेनर को तो बर्खास्त भी कर दिया गया।
किसी जवान या अफसर की तरह सुविधाएं इनके लिए भी
किसी जवान की तरह ही सेना में डॉग्स को आधुनिक मेडिकल सुविधाएं दी जाती हैं। मेरठ में इनके लिए खास डायगोनेस्टिक, इमरजेंसी ट्रीटमेंट, आईसीयू, डेंटल हैल्थ, फिजियोथेरेपी के अलावा सीमन प्रिजर्व करने की भी सुविधा है। इसके अलावा अत्याधुनिक एक्सरसाइज मशीनेें जैसे ट्रेडमिल आदि भी। बाथरूम में टब शावर और स्पा की फाइव स्टार फेसिलिटी भी हैं। देश की सुरक्षा में तैनात डॉग्स के लिए कंबल, टॉवल, पट्टे, ब्रश, रबर बोन्स, बैग्स और ग्लव्स के लिए हर साल टेंडर जारी होते हैं।
हमारे देश के चार सबसे बेहतरीन डॉग्स और उनकी खासियत
हॉस्की: 2010 में लेह में अचानक आई बाढ़ में कई लोग लापता हो गए थे। आर्मी डॉग हॉस्की को हेलिकॉप्टर से मौके पर ले जाया गया। उसने 40 फीट नीचे से 35 शव ढूंढकर निकाले।
रेक्स: 1995 में जम्मू के भद्रवाह में छुपे हुए आतंकी को ढूंढ निकाला। ये आतंकी सेना के साथ हुई फायरिंग में घायल हुआ था। उसके खून को सूंघ कर ही रेक्स उस तक पहुंचा। रेक्स की एक ऑपरेशन के दौरान गोली लगने से मौत हुई थी।
जीतू: 2013 में डॉग जीतू ने अनोखा रिकॉर्ड बनाया। 350 मीटर के दायरे में छुपाकर रखे हुए विस्फोटक और बम को 7 मिनट में ढूंढ निकाला। इस दौरान उसने आग और कई बाधाओं को पार किया। इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उसे पूरे अंक हासिल हुए थे और गोल्ड मेडल भी मिला था।
जंजीर: 1993 में मुंबई में जंजीर ने शहरभर से 3329 किलो आरडीएक्स, 600 डिटोनेटर, 249 हैंडग्रेनेड और 6406 जिंदा कारतूस पकड़वाए थे। 2000 में उसकी मौत के बाद ससम्मान उसका अंतिम संस्कार किया गया था।