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आत्महत्या की कोशिश अब नहीं होगा अपराध, हटेगी धारा 309

7 वर्ष पहले
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(फाइल फोटो)
नई दिल्ली. खुदकुशी की कोशिश अब अपराध की श्रेणी में नहीं आएगी। केंद्र सरकार ने इससे संबंधित धारा 309 को भारतीय दंड संहिता से हटाने का फैसला किया है। धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश पर एक साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

गृह राज्य मंत्री हरिभाई चौधरी ने बुधवार को राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि विधि आयोग ने अपनी 210वीं रिपोर्ट में धारा 309 को हटाने की सिफारिश की थी। कानून व्यवस्था राज्य का विषय होने के कारण इस पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उनकी राय मांगी गयी थी। 18 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों ने इस धारा को समाप्त करने पर सहमति जताई थी। इसे देखते हुए इस धारा को भारतीय दंड संहिता से हटाने का निर्णय लिया गया है।
बता दें लोकसभा में अगस्त में गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था, 'विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि आत्महत्या की कोशिश को मानवीय आधार पर विचार करने और इसके अपराध की श्रेणी से बाहर रखने की जरूरत है।' दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने अरसे पहले कहा था कि ऐसे कानून बहुत हो गए हैं, जो या तो अप्रासंगिक हो चुके हैं, या उन्हें हटाने अथवा खत्म करने की जरूरत है। मोदी ने यह भी कहा था कि पिछली सरकार (यूपीए) को कानून बनाने में आनंद मिलता था और उन्हें खत्म करने में मजा आता है।
SC ने कहा था, ऐसों को मदद की जरूरत, न कि सजा की
सुप्रीम कोर्ट ने भी संसद को सुझाव दिया था कि इस कानून को खत्म किया जाए। तत्कालीन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की बेंच ने कहा था कि एक शख्स डिप्रेशन में आने के बाद आत्महत्या की कोशिश करता है, इसलिए उसे मदद की जरूरत है, न कि सजा की। जो लोग इस कानून को खत्म किए जाने का विरोध कर रहे थे, उनका तर्क था कि आत्महत्या एक अनैतिक काम है और इसे खत्म करने पर ऐसे मामलों में बढ़ोत्तरी आएगी।
कानून हटाने में लंबी जद्दोजहद
इस कानून को हटाने की कोशिशें काफी पहले से हो रही है। 1978 में आईपीसी संशोधन बिल राज्यसभा में पास हो गया, जिसके जरिए सेक्शन 309 को खत्म किया जाना था। लेकिन इससे पहले कि यह बिल लोकसभा में पहुंचता, संसद भंग कर दी गई और बिल पास न हो सका।
1987 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय संविधान के तहत मिलने वाले 'जीवन का अधिकार' में जीने और जान देने, दोनों ही समाहित हैं, इसके साथ ही धारा 309 को खत्म कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को 1994 में बनाए रखा। हालांकि, 1996 में पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया कि संविधानिक तौर पर मिलने पर राइट टू लाइफ में जान देने का अधिकार शामिल नहीं है और धारा 309 वैध है। इसके बाद, 2008 में लॉ कमिशन ने इसे हटाने का सुझाव दिया।