फोटोः अजित सिंह द्वारा बंगला नहीं छोड़ने पर हाल में ही वहां का बिजली-पानी कनेक्शन काट दिया गया था।
नई दिल्ली. दिल्ली के पॉश इलाके लुटियंस में बंगला पाने की चाहत हर नेता की होती है। बंगले का प्रेम ऐसा होता है कि मंत्री पद या सांसदी जाने के बाद भी नेता उसे छोड़ना नहीं चाहते। इसके लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। इसमें सबसे प्रमुख है बंगलों को ट्रस्ट के नाम पर आवंटित करा लेना। पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह को जब बंगला खाली करने का आदेश दिया गया तो उन्होंने भी ऐसा ही करने की कोशिश की, मगर बात नहीं बनी। इसके अलावा सुरक्षा कारणों का हवाला देकर भी नेता बंगले में बने रहना चाहते हैं। नेताओं द्वारा बंगला खाली नहीं करने के कई कारण हैं। इनमें सस्ता किराया प्रमुख है। दरअसल, ये बंगले सब्सिडी रेट पर आवंटित किए जाते हैं और इनका ज्यादा से ज्यादा किराया महज 3500 रुपए महीना होता है।
ट्रस्ट का खेल
अजित सिंह से जब 12 तुगलक रोड स्थित बंगले को खाली करने को कहा गया तो उन्होंने इसे अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नाम पर स्मारक घोषित करने की मांग की थी। हालांकि, बात नहीं बनने पर उन्होंने 24 सितंबर को बंगला खाली करने की बात कही है। बंगले को ट्रस्ट के नाम पर आवंटित कराने का यह पहला मामला नहीं है।
इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर ने भी 2014 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद ऐसा ही रास्ता निकाला था। नीरज उत्तर प्रदेश की बलिया सीट से सपा के टिकट पर चुनाव हार गए थे। उन्होंने भी स्वयं को आवंटित 3 साउथ एवेन्यू का बंगला खाली न करते हुए उसे अपने पिता के नाम पर बने ट्रस्ट को आवंटित करने का आवेदन दिया था, लेकिन बाद में उन्होंने इस मामले में सक्रियता नहीं दिखाई। शहरी विकास मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, 'बंगले का बिजली कनेक्शन काट दिया गया है और हमें उम्मीद है कि जल्द ही बंगला खाली हो जाएगा।'
इसके अलावा यूपीए सरकार में मंत्री रह चुके जितेंद्र सिंह ने भी खुद को आवंटित जनरल पूल का बंगला राज्यसभा पूल में ट्रांसफर कराने की कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने राज्यसभा के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता की मदद भी ली थी, लेकिन उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। इसी तरह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री बूटा सिंह और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारुख अब्दुल्ला ने भी अपने मौजूदा बंगलों को सुरक्षा कारणों का हवाला देकर बचाने की कोशिश की थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने दोनों के मामले शहरी विकास मंत्रालय को भेज दिए। इनके मामले में शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि बूटा सिंह को एसपीजी कवर नहीं मिला हुआ है। इसलिए उनका आवेदन मान्य नहीं किया जा सकता है, जबकि फारुख का मामला अभी भी केंद्रीय गृह मंत्रालय में विचाराधीन है।
बंगले जो मेमोरियल ट्रस्ट में बदले गए-
इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट
पता- 1 अकबर रोड और 1 सफदरजंग रोड
लीज अवधि- 99 साल
स्वीकृति- 2010
लालबहादुर शास्त्री मेमोरियल ट्रस्ट
पता-1 मोतीलाल नेहरू प्लेस
लीज अवधि-25 साल
अनुमति 2000
बहुजन प्रेरणा ट्रस्ट
पता-12,14 और 16 रकाबगंज रोड
लीज अवधि 25 साल
अनुमति-2012
बाबू जगजीवनराम नेशनल फाउंडेशन
पता-6 कृष्णामेनन मार्ग
लीज अवधि-25 साल
अनुमति-2014
ट्रस्ट को दिए गए बंगलों की लाइसेंस फीस (किराया)
टाइप-8 -लगभग 3500 रुपए
टाइप-7 -लगभग 2500 रुपए
टाइप 6- लगभग 1500 रुपए
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