टैक्सी बैन करने से कुछ नियमों का पालन, कुछ ज्यादा काग़ज़ों की खानापूर्ति और कुछ ज्यादा लम्बी प्रक्रिया जरूर हो जाएगी। बस। बेटियों को सुरक्षित करना ही है तो दुष्कर्मियों को, रेपिस्ट को कड़ी से कड़ी सजा देना ही सबसे बड़ा उपाय हो सकता है। इतनी कड़ी सजा, कि अपराधी की रूह कांप उठे। दोबारा ऐसा या इससे भी कमतर अपराध करने से पहले कोई पांच सौ बार सोचे।
दिल्ली में अभी
टैक्सी के अंदर हुए रेप का आरोपी इससे पहले भी ऐसा ही कर चुका है। लेकिन ज़मानत पर छूट गया था। अगर उसे पहले ही कठोरतम सजा मिल गई होती तो क्या वह दोबारा ऐसा करने की हिम्मत करता? नहीं। तो पहले वह क्यों छूट गया?
इसके पहले दिल्ली के निर्भया रेप कांड में भी एक नाबालिग को सजा नहीं मिल पाई थी। क्यों? जबकि उसकी उम्र बालिग होने की उम्र से चार महीने ही कम थी! जब कम उम्र का व्यक्ति जघन्य अपराध करता है तो क्या पीड़िता या पीड़ित का दर्द कम हो जाता है? नहीं। फिर सजा कम क्यों? दरअसल अफ़सोस तो इस बात का है कि हमारा कानून भी इस तरह की कई बेतुकी और अतार्
किक बातों से भरा पड़ा है। कोई समझने को तैयार नहीं। कोई सुधार के लिए आमादा नहीं।
अपराधी कोई भी हो, और उसकी उम्र चाहे जो हो, अगर उसने अपराध किया है तो सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए? निश्चित ही वह भी उतनी ही कड़ी सजा का हकदार है और वह उसे मिलनी ही चाहिए।
सच है, अकेली सरकार किसी को कोई अपराध करने से रोक नहीं सकती लेकिन ऐसे अपराधियों को कठोरतम सजा देने से सरकार को किसने रोक रखा है? क्यों नहीं किए जाते कठोरतम सजा के प्रावधान? सरकार मौन है। लेकिन सरकारें तो सब ऐसी ही होती हैं। हमारे युवाओं को क्या हो गया है? वे क्यों मौन साधे हुए हैं? वे क्यों सामने नहीं आते? क्यों सरकार को मजबूर नहीं कर देते?
अगर बेटियां ही इस देश में सुरक्षित नहीं होंगी तो देश कैसे आगे बढ़ेगा? वो विकास कैसे होगा, जिसकी दुहाई अपने लगभग हर भाषण में प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी देते रहते हैं। हमें और हमारे युवाओं को आगे आना ही होगा। कम से कम इस वक्त हम इस आध्यात्मिक सोच को पकड़कर नहीं बैठे रह सकते कि - मुयी! औरत की कोख न होती और आदमी का पेट न होता तो दुनिया हर संकट से आज़ाद हो जाती!
(लेखक डीबी डिजिटल के नेशनल हेड हैं।)