दिल्ली विधानसभा चुनाव में 'आप' की शानदार जीत होती और भाजपा बुरी तरह हारती दिखाई दे रही है। डीबी डिजिटल के नेशनल एडिटर
नवनीत गुर्जर बता रहे हैं, आखिर क्यों हारी भाजपा और क्या हैं इस हार के मायने:
चुनाव प्रचार से पहले तो 'आप' की ऐसी कोई हवा नहीं थी। फिर प्रचार के दौरान ऐसा क्या हो गया कि 'आप' का ग्राफ़ सबसे ऊपर आ गया?
दरअसल, भाजपा के पैंतरे उलटे पड़ गए। मोदी जी अब तक कांग्रेस को निशाना बना रहे थे। सब को अच्छा लग रहा था। दिल्ली में उन्होंने अपनी पहली ही रैली में
केजरीवाल को निशाना बनाया। यही टर्निंग प्वाइंट रहा। देखिए, बलवान और कमज़ोर की लड़ाई में लोगों की दया कमज़ोर के साथ होती है। केजरीवाल पर लोगों को दया आ गई। आप पार्टी ने इस बात को शुरू से पहचान लिया था। तीन चुनाव हो गए। दिल्ली के पहले चुनाव, फिर लोकसभा चुनाव और फिर ये
तो क्या भाजपा और मोदी ये नहीं जानते थे? फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया?
जानते थे। लेकिन उनकी लगातार जीत इसी तरीके से हो रही थी। सफलता की आंधी में हमारा
कुछ न कुछ तो खोता ही है। हो सकता है, भाजपा की ये समझ भी खो गई हो। उदाहरण के लिए आप 2004 का लोकसभा चुनाव याद कीजिए। सारे दल कांग्रेस के खिलाफ हो गए थे। भाजपा शाइनिंग इंडिया चला रही थी। भाजपा, कुछ अन्य दल ही नहीं, कांग्रेस के ही
शरद पवार ने भी विदेशी का मुद्दा उठा दिया था। सोनिया गांधी ने बड़ी समझदारी से अपने भाषणों की एक ही थीम रखी। उन्होंने कहा- सब मिलकर एक अकेली महिला के पीछे पड़ गए हैं। बात क्लिक कर गई। उम्मीद न होते हुए भी कांग्रेस जीत गई थी। जीत पर एक ही तरह के कार्टून बने थे- राहुल को पीठ पर टांगे हुए सोनिया को हाथ में तलवार लिए घोड़े पर बिठाकर लिखा गया था- ख़ूब लड़ी मर्दानी...
इस ग़लती को भाजपा सुधार भी तो सकती थी?
जरूर सुधार सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वे पूरे दमख़म से केजरीवाल के पीछे पड़ गए। सारे केंद्रीय मंत्रियों को प्रचार में झोंक देना, रोज केजरीवाल के खिलाफ एक विज्ञापन छपवाना, ये सब क्या था? भाजपा के साथ इतनी बड़ी ताकत देखी, लोग कमज़ोर पड़ रहे केजरीवाल के साथ आ गए।
तो क्या वो फ़र्ज़ी चंदे वाला स्टिंग भी आप पार्टी के खिलाफ नहीं गया?
नहीं। इसे भी लोगों ने कमज़ोर के खिलाफ ताक़तवर की चाल के रूप में लिया। फिर फ़र्ज़ी चंदे के स्टिंग ने भाजपा के पक्ष में इसलिए भी काम नहीं किया, क्योंकि संबंध जानते हैं कि चंदा तो सारी पार्टियां ऐसे ही लेती हैं। जो पार्टियां बड़ी हैं, वे अपना अकाउंट ठीक कर लेती हैं। भले ही ऐसा नहीं होता हो, लेकिन लोग ऐसा ही मानते हैं।
अच्छा था। लेकिन फिर शांतिभूषण द्वारा किरण और केजरीवाल की तुलना करना और किरण को श्रेष्ठ बताना भी भाजपा को भारी पड़ा। अब हो सकता है ये भाजपा ने करवाया हो! हो सकता है ये आप पार्टी का मास्टर स्ट्रोक हो, लेकिन इससे भला केजरीवाल का ही हुआ। किरण बेदी की छवि अच्छी है, लेकिन वह भाजपा की गलत प्रचार नीति में बह गई। रही-सही कसर दिल्ली भाजपा के मतभेदों ने पूरी कर दी। किरण बेदी को लाना ही था तो इसकी प्लानिंग पहले से होनी थी। भाजपा ने सोचा कि मोदी और
अमित शाह कह देंगे कि बेदी मुख्यमंत्री होंगी और सब के सब भाजपाई इसे तोते की तरह मान लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं होता। हुआ भी नहीं। ज्यादातर पार्टी नेता कहते रहे- पार्टी का काम है- निबटाना ही पड़ेगा। ... और उन्होंने निबटा दिया।
तो क्या मोदी का वो तिलिस्म अब खत्म हो गया है?
नहीं। ऐसा तो नहीं कहा जा सकता। नीतियां सही होंगी तो भाजपा फिर जीतेगी। मोदी फिर छा जाएंगे। मोदी मोदी हैं और केजरीवाल केजरीवाल। हो सकता है, कल को बिहार में चुनाव हों और मोदी या भाजपा फिर जीत जाए!