(फोटोः प्रतीकात्मक प्रयोग)
नेशनल डेस्क. करीब एक दशक तक अमेरिकी वीजा पाने से वंचित रहे मोदी का अमेरिका में जिस तरह स्वागत-सत्कार हो रहा है, वह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिस अमेरिका ने 2005 में उन्हें वीजा नहीं दिया था, अब उसी के राष्ट्रपति उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट दे रहे हैं, तो उम्मीद से कहीं आगे तक रिश्तों की बात जाएगी। मोदी के मंगलवार को व्हाइट हाउस आगमन पर अमेरिकी सीनेट ने अमेरिका-भारत भागीदारी दिवस मनाने के लिए एकमत से एक प्रस्ताव पारित किया है। यह भी एक नए रिश्ते की शुरुआत है।
वॉशिंगटन आने से पहले मोदी अमेरिका के कॉरपोरेट वर्ल्ड से मुखातिब हो चुके हैं जिसमें उनकी मुलाकात
गूगल के चेयरमैन श्मिट, सिटी ग्रुप के सीईओ माइकल कॉबर्ट, मास्टरकार्ड के सीईओ अजय बंगा और पेप्सी की चेयरमैन इंदिरा नूयी समेत 11 कॉरपोरेट हेड से हुई। मोदी ने मैडिसन स्क्वेयर पर भी स्वीकार किया है कि भारत को अब तक आउटसोर्सिंग हब माना जाता था, लेकिन अब उनके सामने भारत को इन्वेस्टर्स क्लब बनाने की चुनौती है।
मोदी के साथ भारत के लिए भी दौरा अहम
अमेरिकी जमीन पर पहुंचे मोदी के लिए यह दौरा अहम जरूर है, लेकिन उनसे ज्यादा भारत के लिए भी है। अभी तक मोदी का यह दौरा उनसे जुड़े वीजा विवाद के परिप्रेक्ष्य में मिली बड़ी जीत की तरह प्रसारित और प्रचारित किया गया है, लेकिन ओबामा के साथ मोदी की जो द्विपक्षीय वार्ता होनी है, वह मोदी के साथ भारत के लिए भी जरूरी है।
- अमेरिका में पूर्व राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के साथ न्यूयॉर्क में कथित फर्जी वीजा मामले में हुई बदसलूकी के बाद भारत-अमेरिका के रिश्तों में खटास आ गई थी। इसके बाद इस पहली उच्च स्तरीय वार्ता में दोनों देशों के बीच आपसी रिश्ते बढ़ाने और आर्थिक, रक्षा, नागरिक, परमाणु सहयोग, व्यापार तथा तकनीक के आदान-प्रदान पर जोर होगा।
- ये सारे विषय यह तय करेंगे कि दुनिया में भारत की क्या जगह है, जो मोदी-ओबामा वार्ता का एक बड़ा पहलू है।
- यहीं पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता को लेकर भारत की दावेदारी का मसला उभरता है। गौरतलब है कि 2010 में
बराक ओबामा ने कहा था कि वह भारत का समर्थन करेंगे, किंतु अब तक कुछ नहीं हुआ।
रिश्तों को लेकर कोई संधि नहीं-
द्विपक्षीय संबंधों की दुहाई रोज दी जाती है, लेकिन आज तक दोनों देशों के बीच ऐसी कोई संधि नहीं हुई है, जो इन संबंधों को प्रगाढ़ बनाती हो। भारत-अमेरिका के बीच एकमात्र परमाणु समझौता हुआ था। इससे भारत को लाभ हुआ और भारत पर लगे परमाणु प्रतिबंध हटाए गए थे, लेकिन अमेरिका के साथ यह समझौता अभी भी अधर में है। दूसरी ओर, भारतीय प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी भी सख्त और अपने हितों से समझौता न करने वाले हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने यह साबित किया है, लेकिन बतौर प्रधानमंत्री उनकी यह सबसे बड़ी यात्रा है। देखना यह है कि मोदी अपने मिशन अमेरिका में क्या-क्या देकर आते हैं और क्या-क्या लेकर आते हैं?
आगे पढ़ें, फिलहाल कैसा है भारत-अमेरिका व्यापार संबंध और मोदी की यात्रा से क्या हैं उम्मीदें...