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  • Karnataka Poll Results Analysis By Satyendra Ranjan

क्या कहते हैं कर्नाटक के नतीजे?

8 वर्ष पहले
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मुसीबतों से घिरी कांग्रेस कर्नाटक में जीत से राहत पाने की कोशिश करे, तो इसमें कुछ अस्वाभाविक नहीं है। कर्नाटक जैसे महत्त्वपूर्ण राज्य में सरकार बन जाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। फिर ये जीत पूर्ण बहुमत के साथ है। यानी कांग्रेस को बहुमत जुटाने की मशक्कत से नहीं गुजरना पड़ेगा। अगर पांच साल पहले की परिस्थितियों को याद किया जाए तो तब शुरुआत में ही बहुमत जुटाने की कोशिश में बीएस येदियुरप्पा की छवि आरंभिक रूप से धूमिल हो गई थी।
कांग्रेस को ये जीत उस वक्त मिली है, जब मीडिया और मध्यवर्गीय चर्चाओं में आम धारणा है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर उसके खिलाफ जनाक्रोश है। लेकिन पहले हिमाचल प्रदेश और अब कर्नाटक दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम क्या इस धारणा की पुष्टि करते हैं? हिमाचल प्रदेश में तो ठीक चुनाव के पहले केंद्र ने डीजल की कीमत को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने और रसोई गैस सिलिंडरों पर सब्सिडी में कटौती करने का निर्णय लिया था। कर्नाटक में जब मतदान हुआ तो कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार कोयला घोटाले की जांच को गलत ढंग से प्रभावित करने के आरोपों से घिरी थी और घूसखोरी कांड में रेल मंत्री पवन कुमार बंसल के भांजे की गिरफ्तारी का मामला चर्चाओं में छाया हुआ था। इसके बावजूद दोनों राज्यों में कांग्रेस पार्टी के पक्ष में निर्णायक जनादेश आया।
इससे हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? सिर्फ यह कि चुनाव का गतिशास्त्र सभ्रांत वर्ग की सोच से अलग है। पहली बात यह ध्यान में रखने की है कि चुनाव परिणामों के लिए आज भी सामाजिक समीकरण अति-महत्त्वपूर्ण हैं। दूसरी बात यह कि लोगों की राजनीतिक प्रतिक्रिया को तय करने में स्थानीय मुद्दे अधिक अहम होते हैं। तीसरी बात यह कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व का स्वरूप लगातार विखंडित हो रहा है जिससे ऐसे राज्यों की संख्या बढ़ती जा रही है, जहां मुकाबले दो ध्रुवों के बीच सीमित नहीं हैं, बल्कि परिणाम अनेक ध्रुवों की प्रतिस्पर्धा से तय होने लगे हैं।
कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा और बीआर श्रीरामुलू जैसे नेताओं के भाजपा से अलग होने, और रेड्डी बंधुओं के हाशिये पर जाने से भाजपा के सामाजिक आधार में बिखराव आया। यह उसके वोट प्रतिशत में लगी भारी सेंध में जाहिर हुआ है। भाजपा ने राज्य में राजनीतिक नैतिकता, सामाजिक सामंजस्य और आम जन की बेहतरी की पूरी उपेक्षा कर बेहद खराब शासन दिया। इस तरह उसने लोगों के गुस्से को न्योता दिया। चुनाव में उस पर इस नाराजगी की गहरी मार पड़ी है। जहां राजनीतिक प्रतिनिधित्व के विखंडित होने का प्रश्न है, तो यह साफ है कि अब कर्नाटक में कांग्रेस, भाजपा और जनता दल (एस) के रूप में तीन महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पार्टियां हैं। येदियुरप्पा के कर्नाटक जनता पक्ष के रूप में एक ऐसी पार्टी है जो न सिर्फ राज्य के एक प्रभावशाली क्षेत्र में चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है बल्कि खुद कई सीटें जीत भी सकती है जो आगे गठबंधनों का भविष्य तय करने में निर्णायक हो सकता है। बीआरएस कांग्रेस जैसी पार्टी भी एक क्षेत्र विशेष से कई सीटें निकाल कर ऐसी ही हैसियत में आ सकती है। जब मुकाबले इतने ध्रुवों में बंट जाएं, तो कोई अनुमान लगाना कठिन हो जाता है। फिलहाल, कांग्रेस ने निर्णायक जीत दर्ज की है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बिखरते जनाधार की परिघटना उससे छिपी नहीं है।
भारत में अब अनुभव यह है कि किसी चुनाव परिणाम के आधार पर आगे के चुनावों का अंदाजा लगाना लगातार कठिन होता गया है। हर चुनाव फ़ौरी हालात के बीच लड़ा जाता है। कुछ ही महीने बाद होने वाले चुनाव बिल्कुल नए संदर्भ में होते हैं। कर्नाटक से बेहतर इसकी मिसाल और कहां ढूंढी जा सकती है, जहां 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस की लहर चली थी, जिसके दबाव में तत्कालीन जनता पार्टी के मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े ने विधानसभा भंग करवा कर मध्यावधि चुनाव करवाया और सबको भौंचक करते हुए उसमें अपनी पार्टी को सत्ता में वापस ले आए। निष्कर्ष यह कि ताजा नतीजों से आगे के लिए कोई संकेत प्राप्त करने की कोशिश बेकार है। अगले चुनाव अपने संदर्भ और तब की परिस्थितियों में लड़े जाएंगे।