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महाराष्ट्र की राजनीति में अहम है क्षेत्रीय मतदाता, जाने कहां है किस पार्टी का प्रभाव

7 वर्ष पहले
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फोटोः मुंबई में उद्धव ठाकरे से मुलाकात करते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह
नई दिल्ली. महाराष्‍ट्र में करीब डेढ़ दशक पुराना भाजपा-शिवसेना गठबंधन इस सवाल पर टूट गया कि ज्‍यादा दमदार कौन रहेगा? शिवसेना अपने सीएम की मांग पर अड़ी रही तो भाजपा ज्‍यादा सीटों पर दावेदारी छोड़ने को तैयार नहीं हुई। अब कौन कितनी ताकतवर बन कर सामने आएगी, यह तो बाद में पता चलेगा। लेकिन यह सच है कि बीते सालों में महाराष्‍ट्र में भाजपा की ताकत शिवसेना की तुलना में करीब दोगुनी बढ़ी है।
1999 में गठबंधन होने के बाद से लेकर 2009 में हुए विधानसभा चुनाव तक बीजेपी के वोट दोगुने हो गए। वहीं, शिवसेना के वोटों में इजाफा बीजेपी के 99.72 के मुकाबले 56.62 प्रतिशत ही रहा। कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन से दोनों का कोई खास फायदा नहीं हुआ। 1999 में एनसीपी के पहली बार चुनाव लड़ने से लेकर 2009 तक इसका वोट बेस 7.42 लाख के आंकड़े पर स्थिर रहा है। वहीं, कांग्रेस की बात करें तो इस समयावधि में उसके वोट शेयर में 6.8 पर्सेंट की बढ़ोत्‍तरी (89.37 लाख से बढ़कर 95.21 लाख वोट) हुई।
बीजेपी का फायदा
1990 में वोट मिले: 31.8 लाख, वोट शेयर: 10.71 प्रतिशत
2009 में वोट मिले: 63.52 लाख, वोट शेयर: 14.02 प्रतिशत
(1990 से 2009 तक बीजेपी के वोटों में इजाफा: 99.72 प्रतिशत)
शिवसेना की स्थिति
1990 में वोट मिले: 47.33 लाख, वोट शेयर: 15.94 प्रतिशत
2009 में वोट मिले: 73.69 लाख, वोट शेयर: 16.26 प्रतिशत
(1990 से 2009 के बीच शिवसेना के वोटों में इजाफा: 55.62 प्रतिशत)
इस साल हुए लोकसभा चुनाव में स्थिति
बीजेपी को मिले 1.33 करोड़ वोट (27.56 प्रशित शेयर)
शिवसेना ने पाए 1 करोड़ वोट (20.82 प्रतिशत शेयर)
क्षेत्रीय दल रह सकते हैं फायदे में
गठबंधन में रहते हुए तो बीजेपी को खूब फायदा मिला, लेकिन इस बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में चारों बड़ी पार्टियों के अलग चुनाव लड़ने के फैसले से क्षेत्रीय दलों की स्थिति और मजबूत हो सकती है। अभी राज्‍य के अलग-अलग क्षेत्र में क्षेत्रीय दलों का क्‍या हाल है, यह जान लें। यह आकलन 2009 के विधानसभा चुनाव में पार्टियों को मिली सीटों और साल 2014 के आम चुनाव में अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में पार्टियों को मिले वोट के आधार पर किया गया है।
उत्तरी महाराष्ट्र का मतदाता समीकरण (विधानसभा सीटें-47)
नासिक, जलगांव, अहमदनगर, धुले नंदूरबार जिले इस क्षेत्र में आते हैं। नासिक में अंगूर और प्याज की खेती करने वाले अपेक्षाकृत समद्ध किसान रहते हैं। वहीं, नंदूरबार में आदिवासी तबका भी जीवन-यापन करता है। कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को आदिवासी जनजातियों और मुस्लिमों का परंपरागत वोट हासिल होता रहा है और समृद्ध मराठा किसान भी एनसीपी के पक्ष में जाते रहे हैं।
इस क्षेत्र में पार्टियों की स्थिति
पार्टियां 2009 ( विस चुनाव) आम चुनाव 2014
कांग्रेस 9 2
एनसीपी 13 3
भाजपा 5 32
शिवसेना 11 10
अन्य 9 0

इस क्षेत्र में किस पार्टी के लिए क्या है मुश्किल
पिछले चुनावों से पता चला कि एनसीपी को बबनराव पचपुते और विजयकुमार गावित जैसे नेताओं के पार्टी से अलग होने का खामियाजा भुगतना पड़ा। वहीं, कांग्रेस के हाथ से आदिवासी तबके का वोट बैंक धीरे-धीरे निकलता जा रहा है। साथ ही, मनसे का गढ़ माने जाने वाले नासिक में भी मतदाताओं में बिखराव देखने को मिला है।
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